Adhyatmik Katha





प्राण एवं मन का तादात्म्य: कठोपनिषद् विश्लेषण


प्राण एवं मन का तादात्म्य: कठोपनिषद् के परिप्रेक्ष्य में एक गहन शोधपूर्ण विश्लेषण

प्रस्तावना

भारतीय दर्शन की सुदीर्घ परंपरा में उपनिषद् केवल आध्यात्मिक ज्ञान के भंडार नहीं हैं, अपितु वे मानव चेतना, मनोविज्ञान और ब्रह्मांडीय ऊर्जा के गूढ़ रहस्यों को सुलझाने वाले वैज्ञानिक दस्तावेज भी हैं। इनमें से ‘कठोपनिषद्’, जो कृष्ण यजुर्वेद की कठ शाखा से संबद्ध है, अपनी दार्शनिक गंभीरता और यम-नचिकेता संवाद के माध्यम से मृत्यु और अमरत्व के प्रश्नों को संबोधित करने के लिए विश्वविख्यात है। तथापि, इस उपनिषद् का एक अत्यंत महत्वपूर्ण, किंतु प्रायः अल्पचर्चित पहलू है—प्राण और मन के अंतर्संबंधों (Interrelation) का सूक्ष्म विश्लेषण

प्रस्तुत शोधपूर्ण आलेख में हम कठोपनिषद् के आलोक में प्राण (Vital Force) और मन (Mind) के तादात्म्य, उनकी क्रियात्मक एकता और आध्यात्मिक साधना में उनकी भूमिका का अन्वेषण करेंगे। यह विश्लेषण न केवल शास्त्रीय व्याख्याओं पर आधारित होगा, बल्कि आधुनिक मनोविज्ञान के संदर्भ में इसकी प्रासंगिकता को भी रेखांकित करेगा।

कठोपनिषद् की दार्शनिक पृष्ठभूमि और प्राण-मन विमर्श की समकालीन प्रासंगिकता

कठोपनिषद् का प्रारंभ वाजश्रवस ऋषि के यज्ञ और उनके पुत्र नचिकेता की सत्य-जिज्ञासा से होता है। यमलोक में नचिकेता द्वारा मांगे गए तीन वरदानों में से तीसरा वरदान—आत्म-तत्व का ज्ञान—ही इस उपनिषद् का केंद्रीय विषय है। परन्तु, आत्म-तत्व तक पहुँचने की प्रक्रिया में यमदेव ने जिस ‘योग-विधि’ का वर्णन किया है, वह प्राण और मन के संतुलन पर ही आधारित है।

कठोपनिषद् में वर्णित प्रसिद्ध ‘रथ रूपक’ (Chariot Analogy) इस विमर्श की आधारशिला है:

“आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च॥”
(कठोपनिषद् १.३.३)

यहाँ शरीर को रथ, बुद्धि को सारथी और मन को लगाम (प्रग्रह) कहा गया है। इन्द्रियाँ घोड़े हैं। प्रश्न उठता है कि इन घोड़ों (इन्द्रियों) को दौड़ाने वाली ऊर्जा और लगाम (मन) को कसने वाली शक्ति कहाँ से आती है? यहीं पर ‘प्राण’ की भूमिका अपरिहार्य हो जाती है। यद्यपि इस श्लोक में प्रत्यक्ष रूप से ‘प्राण’ शब्द का प्रयोग नहीं है, किन्तु उपनिषद् के उत्तरवर्ती मंत्रों में यह स्पष्ट होता है कि इन्द्रियों और मन की चंचलता को नियंत्रित करने वाला मूल तत्व प्राण ही है।

प्राणिक ऊर्जा का प्रवाह
प्राणिक ऊर्जा का प्रवाह

चित्र विवरण: कठोपनिषद् के रथ रूपक का प्रतीकात्मक चित्रण, जिसमें मन को लगाम और इन्द्रियों को अश्व के रूप में दर्शाया गया है, जो प्राण की ऊर्जा से संचालित हो रहे हैं।

समकालीन प्रासंगिकता: ऊर्जा और चेतना का विखंडन

वर्तमान युग में ‘प्राण एवं मन’ के इस उपनिषद्-विहित संबंध का विश्लेषण अत्यंत प्रासंगिक है। आधुनिक मनोविज्ञान प्रायः मन (Mind) का अध्ययन एक स्वतंत्र इकाई के रूप में करता है, जहाँ विचारों (Thoughts) और भावनाओं (Emotions) का विश्लेषण होता है। परन्तु, भारतीय मनीषा, विशेषकर कठोपनिषद्, यह स्थापित करती है कि मन स्वयं में जड़ है; वह चेतना के प्रकाश और प्राण की ऊर्जा से ही क्रियाशील होता है।

आज समाज में व्याप्त मानसिक व्याधियाँ—अवसाद (Depression), चिंता (Anxiety), और एकाग्रता का अभाव—मूलतः प्राण और मन के बीच के ‘लय-भंग’ (Disharmony) का परिणाम हैं। जब प्राणशक्ति विक्षिप्त होती है, तो मन अस्थिर हो जाता है। कठोपनिषद् स्पष्ट करता है कि:

“यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह।
बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहुः परमां गतिम्॥”
(कठोपनिषद् २.३.१०)

अर्थात्, जब पाँचों इन्द्रियाँ मन के साथ स्थिर हो जाती हैं और बुद्धि भी चेष्टा रहित हो जाती है, वह परम गति है। यह स्थिरता बिना प्राण के नियमन (Regulation of Prana) के संभव नहीं है। आधुनिक तंत्रिका विज्ञान (Neuroscience) भी अब स्वीकार रहा है कि श्वास-प्रश्वास (जो प्राण का स्थूल रूप है) का सीधा प्रभाव मस्तिष्क की तरंगों और मानसिक स्थिति पर पड़ता है। अतः, कठोपनिषद् का यह प्राचीन ज्ञान आज के ‘स्ट्रेस-मैनेजमेंट’ और ‘कॉग्निटिव थेरेपी’ के लिए एक सुदृढ़ आधार प्रदान करता है।

प्राण की अवधारणा: समष्टि (ब्रह्मांडीय) और व्यष्टि (व्यक्तिगत) स्वरूप का विश्लेषण

उपनिषदों में ‘प्राण’ शब्द का अर्थ केवल ‘साँस’ (Breath) तक सीमित नहीं है। व्युत्पत्ति के अनुसार, ‘प्र’ उपसर्ग पूर्वक ‘अन्’ धातु से बना प्राण शब्द उस मौलिक जीवन-शक्ति (Vital Force) का द्योतक है जो संपूर्ण ब्रह्मांड को धारण करती है। कठोपनिषद् में प्राण की चर्चा अत्यंत सूक्ष्म स्तर पर की गई है, जिसे हम दो आयामों में समझ सकते हैं: समष्टि (Macrocosmic) और व्यष्टि (Microcosmic)

१. समष्टि प्राण: हिरण्यगर्भ और ब्रह्मांडीय स्पंदन

समष्टि रूप में प्राण वह सार्वभौमिक ऊर्जा है जिससे समस्त भौतिक जगत की उत्पत्ति और संचालन होता है। कठोपनिषद् में यमदेव नचिकेता को बताते हैं कि अग्नि, सूर्य, वायु और इन्द्र—ये सभी देवता उसी एक भय (अनुशासन) से कार्य करते हैं, जो परब्रह्म की शक्ति है। यह शक्ति ‘प्राण’ के रूप में ही अभिव्यक्त होती है।

“यदिदं किंच जगत् सर्वं प्राण एजति निःसृतम्।
महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति॥”
(कठोपनिषद् २.३.२)

यह मंत्र अत्यंत गूढ़ है। इसका अर्थ है—”यह संपूर्ण जगत, जो कुछ भी अस्तित्व में है, उस ब्रह्म से निकलकर प्राण में ही स्पंदित (Vibrate) हो रहा है।” यहाँ ‘प्राण’ को उस माध्यम या अधिष्ठान (Substratum) के रूप में प्रस्तुत किया गया है जिसमें सृष्टि का नृत्य चल रहा है।

वेदान्त दर्शन में इस समष्टि प्राण को ‘हिरण्यगर्भ’ (Sutratma) कहा गया है। यह वह सूत्र है जो समस्त जीवों को, ग्रहों को और नक्षत्रों को एक माला के मणियों की भांति पिरोकर रखता है। कठोपनिषद् के परिप्रेक्ष्य में, सूर्य (आदित्य) इस समष्टि प्राण का प्रत्यक्ष प्रतीक है। सूर्य न केवल प्रकाश देता है, बल्कि वह ‘प्राण’ का स्रोत है जो पृथ्वी पर जीवन को संभव बनाता है। अतः, मन जब समष्टि प्राण के साथ एकाकार होने का प्रयास करता है, तो वह व्यष्टि सीमाओं (Ego) को लांघकर सार्वभौमिक चेतना (Universal Consciousness) की ओर अग्रसर होता है।

मन की लगाम और इंद्रिय अश्व
मन की लगाम और इंद्रिय अश्व

चित्र विवरण: समष्टि प्राण (हिरण्यगर्भ) और व्यष्टि प्राण (पिंड) के अंतर्संबंध का आरेखीय निरूपण। ब्रह्मांडीय ऊर्जा का व्यक्तिगत शरीर में पंचप्राण के रूप में अवतरण।

२. व्यष्टि प्राण: व्यक्तिगत शरीर में ऊर्जा का विन्यास

जब वह महाप्राण (Cosmic Prana) एक व्यक्तिगत शरीर (पिंड) में प्रवेश करता है, तो वह अपने कार्यों के आधार पर पाँच मुख्य विभागों में विभक्त हो जाता है—प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान। कठोपनिषद् में विशेष रूप से ‘प्राण’ (ऊर्ध्वगामी) और ‘अपान’ (अधोगामी) की चर्चा मिलती है।

“ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयत्यपानं प्रत्यगस्यति।
मध्ये वामनमासीनं विश्वे देवा उपासते॥”
(कठोपनिषद् २.२.३)

यहाँ कहा गया है कि वह (आत्मा) प्राण को ऊपर की ओर ले जाता है और अपान को नीचे की ओर धकेलता है। इनके मध्य में जो ‘वामन’ (अंगुष्ठमात्र पुरुष या अंतरात्मा) विराजमान है, समस्त इन्द्रियाँ (विश्वे देवा) उसी की उपासना करती हैं।

इस संदर्भ में प्राण और मन का संबंध स्पष्ट होता है:

  • प्राण (Prana): यह श्वसन और संवेदी धारणा (Sensory perception) से जुड़ा है। यह मन को बाह्य जगत के विषयों को ग्रहण करने की शक्ति देता है।
  • अपान (Apana): यह निष्कासन की शक्ति है। मनोवैज्ञानिक स्तर पर, यह मन को नकारात्मक विचारों और स्मृतियों को त्यागने में सहायता करता है।
  • समान (Samana): यह पाचन और सात्मीकरण (Assimilation) की शक्ति है। यह विचारों को पचाकर उन्हें ज्ञान (Wisdom) में बदलने के लिए आवश्यक है।

कठोपनिषद् का ऋषि यह संकेत दे रहा है कि मन स्वतंत्र रूप से कार्य नहीं कर सकता। यदि प्राण और अपान का संतुलन बिगड़ जाए, तो ‘मध्य में आसीन’ उस आत्म-तत्व का अनुभव मन नहीं कर सकता। मन की एकाग्रता के लिए प्राण की ऊर्ध्वगति आवश्यक है। सामान्यतः प्राणशक्ति विषयों के भोग में व्यय होती है (बहिर्मुखी), किन्तु योग साधना द्वारा जब इसे अंतर्मुखी किया जाता है, तो यही प्राण मन को ‘अमन’ (No-mind state) की ओर ले जाता है।

प्राण, मन और इन्द्रियों का सोपान-क्रम (Hierarchy)

कठोपनिषद् (१.३.१०-११) में तत्वों का एक सोपान-क्रम दिया गया है, जो प्राण और मन की स्थिति को और स्पष्ट करता है:

  1. इन्द्रियों से श्रेष्ठ अर्थ (विषय) हैं।
  2. अर्थों से श्रेष्ठ मन है।
  3. मन से श्रेष्ठ बुद्धि है।
  4. बुद्धि से श्रेष्ठ महत (महान आत्मा/समष्टि बुद्धि) है।
  5. महत से श्रेष्ठ अव्यक्त (प्रकृति) है।
  6. अव्यक्त से श्रेष्ठ पुरुष (शुद्ध चेतना) है।

इस पदानुक्रम में यद्यपि ‘प्राण’ को अलग से श्रेणीबद्ध नहीं किया गया है, तथापि वेदांत की टीकाओं (विशेषकर आदि शंकराचार्य के भाष्य) के अनुसार, ‘महत’ और ‘अव्यक्त’ के स्तर पर समष्टि प्राण की भूमिका अंतर्निहित है। मन इन्द्रियों का राजा है, परन्तु मन को भी संचालित करने वाली सूक्ष्म शक्ति प्राण है जो बुद्धि और आत्मा के निर्देशानुसार कार्य करती है।

शोधपूर्ण दृष्टि से देखें तो, यहाँ एक महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक सिद्धांत उभरता है: “ऊर्जा का उर्ध्वपातन” (Sublimation of Energy)। मन प्रायः इन्द्रियों के स्तर पर जीता है। उसे उच्चतर आयाम (बुद्धि और आत्मा) तक ले जाने के लिए जिस ‘ईंधन’ की आवश्यकता होती है, वह परिष्कृत प्राण ही है। नचिकेता द्वारा पूछी गई अग्नि-विद्या (द्वितीय वरदान) वास्तव में इसी प्राण-ऊर्जा को जागृत करने की विद्या थी, ताकि मन को भौतिक बंधनों से मुक्त कर आध्यात्मिक ऊंचाइयों तक पहुँचाया जा सके।

अगले खंड में, हम विस्तार से चर्चा करेंगे कि कैसे यह प्राण-मन का तादात्म्य योग साधना में ‘इन्द्रिय-धारण’ (Control of Senses) का आधार बनता है और कठोपनिषद् इसे मृत्यु पर विजय प्राप्त करने का साधन मानता है।






कठोपनिषद् के गूढ़ रहस्यों की हमारी यात्रा में, हमने अब तक प्राण और मन के मूलभूत स्वरूप और उनके तादात्म्य की भूमिका को समझा। यमराज और नचिकेता के संवाद में छिपा यह ज्ञान केवल दार्शनिक नहीं, अपितु एक व्यावहारिक विज्ञान है। अब हम इस विश्लेषण को और अधिक गहराई में ले जाते हुए, मन की चंचलता और प्राणिक नियंत्रण के बीच के सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक संबंधों का अन्वेषण करेंगे, तथा उस प्रसिद्ध ‘रथ रूपक’ (Chariot Allegory) की मीमांसा करेंगे जो भारतीय मनोविज्ञान का आधार स्तंभ है।

मन की चंचलता एवं प्राणिक नियंत्रण के मध्य अंतर्संबंध: एक मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण

कठोपनिषद् में वर्णित योग की परिभाषा अत्यंत स्पष्ट और मनोवैज्ञानिक है। यमराज कहते हैं कि जब पांचों ज्ञानेंद्रियां मन के साथ स्थिर हो जाती हैं और बुद्धि भी चेष्टा नहीं करती, तब वह अवस्था ‘परम गति’ कहलाती है। परन्तु, यह स्थिरता प्राप्त करना इतना कठिन क्यों है? इसका उत्तर मन और प्राण के बीच के गहरे अंतर्संबंध में छिपा है।

आधुनिक मनोविज्ञान जिसे ‘चिंता’ (Anxiety) या ‘तनाव’ (Stress) कहता है, उसे उपनिषद् और योग शास्त्र ‘चित्त की वृत्तियों’ के रूप में देखते हैं। मन स्वभाव से चंचल है; यह संकल्प और विकल्प के बीच निरंतर झूलता रहता है। हठयोग प्रदीपिका में एक प्रसिद्ध सूत्र है: “चले वाते चलं चित्तं निश्चले निश्चलं भवेत्” अर्थात् जब तक प्राण (श्वास) चलायमान है, तब तक चित्त (मन) भी चलायमान रहता है। जब प्राण निश्चल हो जाता है, तो मन भी स्थिर हो जाता है। कठोपनिषद् इस सिद्धांत का बीजारोपण करता है जब वह इंद्रियों को वश में करने के लिए ‘अप्रमत्त’ (सावधान/जागरूक) होने की बात करता है।

हृदय कमल में आत्मज्योति
हृदय कमल में आत्मज्योति

चित्र विवरण: प्राण और मन के बीच का संबंध – जैसे हवा जल में लहरें पैदा करती है, वैसे ही प्राण का प्रवाह मन में विचार उत्पन्न करता है।

मनोवैज्ञानिक विक्षेप और प्राणिक उपचार

मन की चंचलता का मुख्य कारण ऊर्जा का असंतुलित प्रवाह है। जब हम किसी विषय वस्तु (Sense Object) के प्रति आकर्षित होते हैं, तो हमारा ‘प्राण’ उस दिशा में बहने लगता है। कठोपनिषद् (2.1.1) में कहा गया है कि स्वयंभू ने इंद्रियों के द्वार बाहर की ओर बनाए हैं (पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भूः), इसलिए मनुष्य बाहर की ओर देखता है, अंतरात्मा को नहीं। यह ‘बहिर्मुखी प्रवाह’ ही मन की अस्थिरता है।

मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से, जब प्राण अनियंत्रित होता है, तो यह ‘सहानुभूति तंत्रिका तंत्र’ (Sympathetic Nervous System) को अत्यधिक सक्रिय कर देता है, जिससे ‘फाइट और फ्लाइट’ (लड़ो या भागो) की प्रतिक्रिया होती है। यह अवस्था मन को कभी शांत नहीं होने देती। कठोपनिषद् में नचिकेता द्वारा पूछा गया तीसरा वरदान वास्तव में इसी अशांति से मुक्ति पाने का उपाय है। यमराज नचिकेता को समझाते हैं कि मन को नियंत्रित करने के लिए सीधे मन से लड़ना व्यर्थ है; इसके लिए प्राण रूपी लगाम को कसना आवश्यक है।

यहाँ ‘प्राणिक नियंत्रण’ का अर्थ केवल सांस रोकना नहीं है, बल्कि ‘ऊर्जा का उर्ध्वगमन’ है। जब साधक अपनी प्राण शक्ति को बाहरी विषयों से हटाकर (प्रत्याहार), उसे बुद्धि के नियंत्रण में लाता है, तो मन स्वतः ही दर्पण की भांति स्वच्छ और स्थिर हो जाता है। इस प्रक्रिया में निम्नलिखित चरण महत्वपूर्ण हैं:

  • विषय-वितृष्णा: मन की चंचलता तब घटती है जब प्राण को यह निर्देश मिलता है कि बाहरी सुख क्षणिक हैं (श्रेयस बनाम प्रेयस)।
  • एकाग्रता: प्राण को एक बिंदु पर केंद्रित करने से मन की तरंगें शांत होती हैं।
  • लय: अंततः मन का प्राण में और प्राण का आत्म-तत्व में लय हो जाना।

रथ रूपक का विस्तृत विवेचन: इंद्रिय, मन, बुद्धि और आत्मा का श्रेणीबद्ध संबंध

कठोपनिषद् का सबसे प्रतिष्ठित और दार्शनिक रूप से समृद्ध भाग अध्याय 1, वल्ली 3 में वर्णित ‘रथ रूपक’ है। यह रूपक मानव अस्तित्व की जटिल संरचना को समझने के लिए एक संपूर्ण ‘ब्लूप्रिंट’ प्रदान करता है। यमराज नचिकेता को आत्म-ज्ञान समझाने के लिए एक रथ का उदाहरण देते हैं। यह केवल एक काव्यमय कल्पना नहीं है, बल्कि इसमें ‘हाइरार्की ऑफ कंट्रोल’ (नियंत्रण का पदानुक्रम) छिपा है जो आध्यात्मिक उन्नति के लिए अनिवार्य है।

आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु ।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥ (1.3.3)
इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान् ।
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ॥ (1.3.4)

अर्थात्: “आत्मा को रथी (रथ का स्वामी) जानो, शरीर को रथ, बुद्धि को सारथी और मन को लगाम समझो। इंद्रियों को घोड़े कहा गया है और विषयों को उन घोड़ों के विचरने का मार्ग। विद्वान लोग आत्मा, इंद्रिय और मन से युक्त जीवात्मा को ही ‘भोक्ता’ कहते हैं।”

यम-नचिकेता का दिव्य संवाद
यम-नचिकेता का दिव्य संवाद

चित्र विवरण: कठोपनिषद् का रथ रूपक – पांच घोड़े (इंद्रियां), लगाम (मन), सारथी (बुद्धि) और पीछे बैठा यात्री (आत्मा)।

1. आत्मा: रथी (The Master of the Chariot)

इस रूपक में सबसे महत्वपूर्ण, फिर भी सबसे निष्क्रिय तत्व ‘रथी’ या आत्मा है। रथी वह है जो रथ में यात्रा कर रहा है। रथ का उद्देश्य रथी को उसके गंतव्य तक पहुँचाना है। आधुनिक मनोविज्ञान में इसे ‘साक्षी भाव’ (Witness Consciousness) कहा जा सकता है। आत्मा न तो घोड़े हांकती है, न ही लगाम पकड़ती है; वह केवल दृष्टा है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब रथी सो जाता है या सारथी (बुद्धि) रथी के आदेशों की अनदेखी करता है। कठोपनिषद् का उद्देश्य रथी को जागृत करना है ताकि वह अपनी यात्रा का आनंद ले सके, न कि दुर्घटनाग्रस्त हो।

2. शरीर: रथ (The Body as the Chariot)

शरीर वह वाहन है जिसके माध्यम से यह जीवन यात्रा संभव है। एक रथ की तरह, शरीर को भी रखरखाव की आवश्यकता होती है, लेकिन यह स्वयं में जड़ है। यदि घोड़े (इंद्रियां) इसे गलत दिशा में खींचते हैं, तो शरीर नष्ट हो जाएगा। शरीर का अपना कोई स्वतंत्र इच्छाबल नहीं है; यह केवल अधीन है।

3. बुद्धि: सारथी (The Intellect as the Charioteer)

सफलता और विफलता के बीच का निर्णायक कारक ‘सारथी’ है। बुद्धि (Intellect/Discrimination) के पास ही निर्णय लेने की क्षमता है। एक कुशल सारथी वह है जो जानता है कि गंतव्य क्या है और घोड़ों को कब ढील देनी है और कब कसना है। कठोपनिषद् में इसे ‘विज्ञान-सारथी’ कहा गया है।

यदि सारथी (बुद्धि) मदिरापान कर ले (अविवेक, मोह, या अज्ञान से ग्रसित हो जाए) या सो जाए, तो लगाम उसके हाथ से छूट जाएगी। आधुनिक संदर्भ में, जब हम भावनात्मक आवेगों में निर्णय लेते हैं, तो इसका अर्थ है कि हमारा सारथी (बुद्धि) अक्षम हो गया है। एक ‘विज्ञानवान’ (ज्ञानी) सारथी ही विष्णु के परम पद (मोक्ष) तक रथ को ले जा सकता है।

4. मन: प्रग्रह (The Mind as the Reins)

यह इस विश्लेषण का सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी पहलू है। मन को ‘लगाम’ कहा गया है। लगाम का कार्य घोड़ों (इंद्रियों) की शक्ति को सारथी (बुद्धि) तक पहुँचाना और सारथी के आदेशों को घोड़ों तक संप्रेषित करना है।

  • कसी हुई लगाम: जब मन, बुद्धि के पूर्ण नियंत्रण में होता है और प्राण शक्ति से युक्त होता है, तो वह घोड़ों को नियंत्रित रखता है। इसे ‘संकल्प-विकल्पात्मक मन’ की जगह ‘एकाग्र मन’ कहते हैं।
  • ढीली लगाम: यदि मन कमजोर है, चंचल है, या उसमें प्राणिक बल (Willpower) की कमी है, तो वह ढीली लगाम की तरह है। ऐसी स्थिति में बुद्धि चाहकर भी इंद्रियों को रोक नहीं पाती। हम अक्सर कहते हैं, “मैं जानता हूँ यह गलत है, पर मैं खुद को रोक नहीं पा रहा।” यह ‘ढीली लगाम’ (कमजोर मन) का उदाहरण है।

5. इंद्रियां: हय (The Senses as Horses)

इंद्रियां (आंख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) घोड़ों के समान शक्तिशाली हैं। उनमें गति है, ऊर्जा है और विषयों की ओर दौड़ने की प्राकृतिक प्रवृत्ति है। घोड़े बुरे नहीं होते, उनकी ऊर्जा रथ को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक है। कठोपनिषद् कहता है कि दुष्ट घोड़े (दुष्टाश्वा) उन्हें कहते हैं जो प्रशिक्षित नहीं हैं।

यदि घोड़ों को सही दिशा (मार्ग/विषय) न दी जाए, तो वे रथ को खाई में गिरा देंगे। उपनिषद् स्पष्ट करता है कि जो व्यक्ति ‘अविज्ञानवान’ (विवेकहीन) है और जिसका मन अनियंत्रित (अयुक्त मन) है, उसकी इंद्रियां उसी प्रकार दुष्ट हो जाती हैं जैसे सारथी के लिए दुष्ट घोड़े। इसके विपरीत, ‘विज्ञानवान’ और ‘युक्त मन’ वाले व्यक्ति की इंद्रियां वश में रहती हैं, जैसे अच्छे सारथी के वश में सधे हुए घोड़े।

श्रेणीबद्ध संबंध (Hierarchical Relationship) का निष्कर्ष

इस रूपक से जो पदानुक्रम उभरता है, वह भारतीय मनोविज्ञान का सार है:

इंद्रियां < मन < बुद्धि < महान आत्मा < अव्यक्त < पुरुष

कठोपनिषद् (1.3.10-11) में यमराज बताते हैं कि इंद्रियों से परे मन है, मन से परे बुद्धि है, और बुद्धि से परे महान आत्मा है। एक साधक को चाहिए कि वह इस पदानुक्रम का सम्मान करे। हम अक्सर इंद्रियों के स्तर पर समस्याओं को सुलझाने की कोशिश करते हैं (जैसे, किसी लत को जबरदस्ती रोकना), जबकि समाधान बुद्धि और मन के स्तर पर होना चाहिए।

प्राण का तादात्म्य यहाँ ‘लगाम की मजबूती’ के रूप में देखा जा सकता है। प्राण वह शक्ति है जो मन रूपी लगाम को तानकर रखती है। यदि प्राण शक्ति क्षीण है, तो मन ढीला पड़ जाएगा और बुद्धि का नियंत्रण समाप्त हो जाएगा। अतः, नचिकेता की अग्नि विद्या (प्राण विद्या) और यह रथ रूपक (मनोविद्या) एक दूसरे के पूरक हैं। बिना प्राणिक बल के, श्रेष्ठ बुद्धि वाला सारथी भी बेकाबू घोड़ों को नहीं संभाल सकता।

इस प्रकार, कठोपनिषद् का यह रथ रूपक हमें सिखाता है कि जीवन की सार्थकता तब है जब रथी (आत्मा) जागृत हो, सारथी (बुद्धि) विवेकी हो, लगाम (मन) प्राणवान और कसी हुई हो, और घोड़े (इंद्रियां) अनुशासित होकर सही मार्ग पर अग्रसर हों। यही आत्म-समीकरण (Self-Alignment) मोक्ष का द्वार है।






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योग साधना के अंतर्गत प्राण और मन का लय: नचिकेता की जिज्ञासा और यम का समाधान

भारतीय अध्यात्म के आकाश में कठोपनिषद एक ऐसे ध्रुव तारे के समान है, जो युगों से मुमुक्षुओं को आत्म-साक्षात्कार का मार्ग दिखाता आ रहा है। योग साधना केवल शारीरिक आसनों का नाम नहीं है, बल्कि यह प्राण और मन के उस सूक्ष्म संतुलन की प्रक्रिया है, जहाँ जीवात्मा अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानती है। इस संदर्भ में नचिकेता और यम का संवाद न केवल मृत्यु के रहस्य को उजागर करता है, बल्कि ‘अध्यात्म योग’ की व्यावहारिक विधि को भी स्पष्ट करता है।

बालक नचिकेता की जिज्ञासा साधारण नहीं थी। उसने नश्वर भोगों, दीर्घायु और स्वर्गीय सुखों को ठुकराकर मृत्यु के देवता यम से वह ज्ञान माँगा जो मृत्यु के पार है। नचिकेता का प्रश्न था—“मृत्यु के बाद आत्मा का क्या होता है? क्या वह रहती है या नहीं?” यह प्रश्न वस्तुतः अस्तित्व के मूल और मन के पार जाने की विधि के बारे में था। यमराज ने नचिकेता को जो उपदेश दिया, वही योग का सार है: प्राण और मन का लय।

प्राण-मन का सूक्ष्म ताना-बाना
प्राण-मन का सूक्ष्म ताना-बाना

चित्र: नचिकेता और यमराज के बीच गहन आध्यात्मिक संवाद का चित्रण

शरीर रूपी रथ और मन की लगाम

यम ने नचिकेता को योग की प्रक्रिया समझाने के लिए ‘रथ रूपक’ (Ratha Kalpana) का प्रयोग किया। उन्होंने कहा:

“आत्मानँ रथिनं विद्धि शरीरँ रथमेव तु।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च॥”

अर्थात्, आत्मा को रथी (रथ का स्वामी) जानो, शरीर को रथ, बुद्धि को सारथी (चालक) और मन को लगाम। इन्द्रियाँ घोड़े हैं और विषय उन घोड़ों के मार्ग हैं। यहाँ प्राण और मन के संबंध की सबसे महत्वपूर्ण कुंजी छिपी है। यदि लगाम (मन) ढीली हो, तो घोड़े (इन्द्रियाँ) अनियंत्रित होकर रथ को खड्ढे में गिरा देंगे। बुद्धि रूपी सारथी को चाहिए कि वह मन रूपी लगाम को कसकर पकड़े।

योग साधना में ‘प्राण’ वह शक्ति है जो इस रथ को चला रही है। हठयोग भी कहता है—“चले वाते चलं चित्तं निश्चले निश्चलं भवेत्” (जब प्राण चलता है, तो चित्त चलता है; जब प्राण स्थिर होता है, तो चित्त स्थिर हो जाता है)। यमराज नचिकेता को समझाते हैं कि जो व्यक्ति विज्ञानवान (विवेकशील) है और जिसका मन समाहित (नियंत्रित) है, उसकी इन्द्रियाँ उसी प्रकार वश में रहती हैं जैसे अच्छे सारथी के वश में सधे हुए घोड़े।

अध्यात्म योग: लय की प्रक्रिया

यम ने नचिकेता को जिस ‘अध्यात्म योग’ का उपदेश दिया, वह मन और प्राण को अपने मूल स्रोत में विलीन (लय) करने की प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया बाहर से भीतर की ओर यात्रा है। यम कहते हैं:

“यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेज्ज्ञान आत्मनि…”
बुद्धिमान साधक को चाहिए कि वह अपनी वाणी (और समस्त इन्द्रियों) को मन में निरुद्ध करे। वाणी का मन में लय होने का अर्थ है कि बाह्य क्रियाएँ बंद हो जाएं और केवल मानसिक स्पंदन शेष रहे। इसके पश्चात, उस मन को ज्ञान-स्वरूप बुद्धि (Intellect) में विलीन करे। जब मन बुद्धि में लीन होता है, तो संकल्प-विकल्प समाप्त हो जाते हैं और केवल निश्चयवात्मिका वृत्ति शेष रहती है।

अगले चरण में, बुद्धि को ‘महत् आत्मा’ (Cosmic Mind/Hiranyagarbha) में विलीन करना होता है। यह व्यष्टि अहंकार के समष्टि में लय होने की अवस्था है। और अंत में, उस महत् आत्मा को ‘शांत आत्मा’ (शुद्ध पुरुष) में विलीन कर देना चाहिए। यही परम गति है।

इस पूरी प्रक्रिया में प्राण का स्थिरीकरण अनिवार्य है। जब तक प्राण चंचल है, मन बुद्धि में लीन नहीं हो सकता। कठोपनिषद स्पष्ट रूप से योग की परिभाषा देता है—“तां योगमिति मन्यते स्थिरामिन्द्रियधारणाम्” (इन्द्रियों की स्थिर धारणा को ही योग कहते हैं)। जब पाँचों ज्ञानेंद्रियाँ मन के साथ स्थिर हो जाती हैं और बुद्धि भी चेष्टा नहीं करती, वह ‘परम गति’ है। यह अवस्था बिना प्राण-मन के सामंजस्य और लय के संभव नहीं है। नचिकेता को दिया गया यह उपदेश सिद्ध करता है कि आत्म-साक्षात्कार केवल बौद्धिक विलास नहीं, बल्कि प्राण ऊर्जा के ऊर्ध्वगमन और मन के निग्रह की एक कठोर तपस्या है।

निष्कर्ष: आत्म-बोध एवं जीवन-मुक्ति की प्राप्ति में प्राण-मन सामंजस्य की अनिवार्यता

नचिकेता और यम के संवाद से प्रवाहित होने वाली ज्ञान गंगा अंततः इस निष्कर्ष पर पहुँचती है कि आत्म-बोध (Self-Realization) और जीवन-मुक्ति के लिए प्राण और मन का एक लय में आना न केवल आवश्यक है, बल्कि अनिवार्य है। आधुनिक युग में जहाँ योग को मात्र शारीरिक स्वास्थ्य तक सीमित कर दिया गया है, वहाँ उपनिषदों का यह संदेश हमें योग के वास्तविक उद्देश्य की याद दिलाता है।

प्राण और मन एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। मन ‘ज्ञानेन्द्रिय’ पक्ष है और प्राण ‘कर्मेन्द्रिय’ पक्ष। जब मन में विक्षेप (Disturbance) होता है, तो श्वास की गति अनियमित हो जाती है। इसके विपरीत, जब हम प्राणायाम के माध्यम से श्वास को लयबद्ध करते हैं, तो मन स्वतः शांत होने लगता है। आत्म-बोध की प्राप्ति चंचल मन रूपी दर्पण में नहीं हो सकती। जैसे हिलते हुए पानी में चंद्रमा का प्रतिबिंब स्पष्ट नहीं दिखता, वैसे ही वासनाओं और विचारों के कोलाहल से भरे मन में आत्मा का स्वरूप नहीं झलकता।

शाश्वत ज्ञान की पांडुलिपि
शाश्वत ज्ञान की पांडुलिपि

चित्र: समाधि की अवस्था – प्राण और मन के पूर्ण लय का प्रतीक

हृदय की ग्रन्थियों का भेदन

यमराज अंत में एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात कहते हैं—“यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः” (जब हृदय में आश्रित समस्त कामनाएँ छूट जाती हैं, तब मरणधर्मा मनुष्य अमर हो जाता है)। यह कामनाएँ मन की तरंगें हैं जो प्राण के असंतुलन से जीवित रहती हैं।

प्राण और मन के सामंजस्य से ही ‘सुषुम्ना नाड़ी’ का द्वार खुलता है। उपनिषद वर्णन करता है कि हृदय से एक सौ एक नाड़ियाँ निकलती हैं, उनमें से एक (सुषुम्ना) मूर्धा (सिर) की ओर जाती है। जब योगी अपने प्राण और मन को संयुक्त करके इस मार्ग से ऊपर उठता है, तभी वह मृत्यु के चक्र से मुक्त होकर अमृतत्व (Immortality) को प्राप्त होता है। इसे ही जीवन-मुक्ति कहा गया है—शरीर में रहते हुए भी शरीर के धर्मों से अछूता रहना।

अंतिम सत्य

अतः, निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि आध्यात्मिक साधना में द्वैत का कोई स्थान नहीं है। प्राण और मन का संघर्ष ही बंधन है, और उनका मैत्रीपूर्ण लय ही मोक्ष है। जब साधक ‘ओम’ के उच्चारण (प्रणव साधना) अथवा ध्यान के माध्यम से प्राण को सूक्ष्म करता है, तो मन भी सूक्ष्म होकर अपने कारण (आत्मा) में लीन हो जाता है।

नचिकेता की जिज्ञासा केवल उसकी अपनी नहीं थी, वह हर उस साधक की जिज्ञासा है जो नश्वरता से परे जाना चाहता है। यम का समाधान हमें यह मार्ग दिखाता है कि बाहर की दौड़ बंद करके, अपनी इन्द्रियों और मन को समेटकर, प्राण की अग्नि में तपाकर ही उस ‘अंगुष्ठमात्र पुरुष’ (अंतरात्मा) का दर्शन किया जा सकता है। यह सामंजस्य ही वह कुंजी है जो अविद्या के ताले को खोलती है और जीव को शिव से मिलाती है। यही योग का परम लक्ष्य है और यही मानव जीवन की सार्थकता है।

॥ इति शुभम् ॥


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