Adhyatmik Katha

ध्यान मुद्रा में पंचमुखी हनुमान की दिव्य छवि जो पंच प्राणों के संतुलन को दर्शाती है।
ध्यान मुद्रा में पंचमुखी हनुमान की दिव्य छवि जो पंच प्राणों के संतुलन को दर्शाती है।

पंचमुखी हनुमान एवं कुण्डलिनी जागरण: पंचप्राणों के गूढ़ यौगिक रहस्यों का आध्यात्मिक विवेचन

भारतीय अध्यात्म के अनंत आकाश में हनुमान जी केवल रामभक्ति के सर्वोच्च शिखर ही नहीं हैं, अपितु वे ‘योगिनाम वरिष्ठम्’ भी हैं। योग शास्त्रों और तंत्र विद्या के गूढ़ रहस्यों में हनुमान जी का स्वरूप मात्र एक पौराणिक देवता का नहीं, बल्कि स्वयं ‘महाप्राण’ का विग्रह है। जब हम पंचमुखी हनुमान के स्वरूप का चिंतन करते हैं, तो हम वस्तुतः उस ब्रह्मांडीय ऊर्जा के मानचित्र का अध्ययन कर रहे होते हैं जो पिण्ड (शरीर) और ब्रह्माण्ड के बीच सेतु का कार्य करती है। पंचमुखी स्वरूप का प्राकट्य, जो कथाओं में अहिरावण वध के निमित्त हुआ, उसका यौगिक अर्थ अत्यंत गहरा है। यह स्वरूप कुण्डलिनी जागरण, पंच-महाभूतों के शोधन और पंचप्राणों (प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान) के संतुलन की सर्वोच्च अवस्था का प्रतीक है। एक साधक की दृष्टि से, पंचमुखी हनुमान तंत्र और योग का वह बीज मंत्र हैं जिसके माध्यम से सुषुम्ना के द्वार खोले जा सकते हैं। इस लेख में, हम भक्ति के आवरण के भीतर छिपे उस कठोर योग विज्ञान का विश्लेषण करेंगे जो जीव को शिवत्व की ओर ले जाता है।

“नमो मर्कटेशाय, ओंकार-स्वरूपाय, पंच-तत्त्व-विशोधकाय।
प्राणाग्नि-होत्र-भूताय, पंचमुखी-हनुमते नमः॥”

पंचमुखी स्वरूप का तात्त्विक अर्थ: हनुमान के पाँच मुख और पंच महाभूतों का सामंजस्य

सृष्टि का निर्माण पंच महाभूतों—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—से हुआ है। मानव शरीर भी इन्हीं पंचतत्त्वों का संघात है। योग का अंतिम लक्ष्य इन तत्त्वों पर विजय प्राप्त करना (तत्त्व-जय) है। पंचमुखी हनुमान का प्रत्येक मुख एक विशिष्ट तत्त्व, एक विशिष्ट दिशा और चेतना के एक विशिष्ट आयाम का प्रतिनिधित्व करता है। जब एक योगी इन पाँच मुखों का ध्यान करता है, तो वह वास्तव में अपने मूलाधार से लेकर सहस्रार तक की यात्रा को सुगम बना रहा होता है।

१. पूर्व मुख: वानर (मूल हनुमान स्वरूप) – आत्मबल एवं आकाश तत्त्व

भगवान हनुमान का मूल मुख, जो वानर रूप में है और पूर्व दिशा की ओर देखता है, वह ‘आत्मतेज’ का प्रतीक है। यद्यपि हनुमान वायुपुत्र हैं, किन्तु उनका मूल मुख आकाश तत्त्व की व्यापकता और निर्लिप्तता को दर्शाता है। पूर्व दिशा सूर्योदय की दिशा है, जो ज्ञान और चेतना के उदय का संकेत है। जिस प्रकार आकाश (Space) सब कुछ धारण करते हुए भी किसी से लिप्त नहीं होता, वैसे ही वानर मुख साधक को ‘साक्षी भाव’ में स्थित होने की प्रेरणा देता है। कुण्डलिनी विज्ञान में, यह मुख चित्त की वृत्तियों के निरोध और मन की एकाग्रता का द्योतक है। यह साधक को स्मरण दिलाता है कि वह शरीर नहीं, अपितु अनंत चेतना है।

२. दक्षिण मुख: नृसिंह – अग्नि तत्त्व एवं अभय

दक्षिण दिशा की ओर उन्मुख भगवान नृसिंह का मुख उग्रता और परिवर्तन का प्रतीक है। यौगिक दृष्टि से यह ‘अग्नि तत्त्व’ का प्रतिनिधित्व करता है। योग में अग्नि का अर्थ केवल भौतिक आग नहीं, बल्कि ‘जठराग्नि’ और ‘योगाग्नि’ है। कुण्डलिनी जागरण के लिए यह आवश्यक है कि साधक के भीतर का भय और अशुद्धियाँ जलकर भस्म हो जाएं। नृसिंह स्वरूप, जो भय का नाश करने वाला है, मणिपुर चक्र की अग्नि को प्रज्वलित करता है। यह मुख साधक को यह शक्ति प्रदान करता है कि वह अपनी वासनाओं और संस्कारों को तप की अग्नि में होम कर सके। बिना इस अग्नि के, सुषुम्ना नाड़ी में प्राण का ऊर्ध्वगमन संभव नहीं है।

३. पश्चिम मुख: गरुड़ – वायु तत्त्व एवं विष-हरण

पश्चिम दिशा की ओर गरुड़ मुख स्थित है। गरुड़ पक्षियों के राजा हैं और उनकी गति मन के समान मानी गई है। यह मुख स्पष्ट रूप से ‘वायु तत्त्व’ का परिचायक है। योग में वायु तत्त्व का संबंध स्पर्श और गति से है। गरुड़ मुख का एक प्रमुख कार्य ‘विष-हरण’ माना गया है। आध्यात्मिक संदर्भ में, ‘विष’ का अर्थ है—विषय वासनाएं और नकारात्मक ऊर्जाएं जो नाड़ियों में अवरोध (Blockages) उत्पन्न करती हैं। जब कुण्डलिनी शक्ति जागृत होती है, तो शरीर में अनेक प्रकार के वेग उत्पन्न होते हैं; गरुड़ मुख उस प्राण-वायु को संतुलित करता है और साधक को ‘खेचरी मुद्रा’ (आकाश में विचरण करने की अवस्था) की ओर अग्रसर करता है। यह अनाहत चक्र की वायु को शुद्ध करता है।

४. उत्तर मुख: वाराह – पृथ्वी तत्त्व एवं स्थिरता

उत्तर दिशा की ओर वाराह मुख है। भगवान विष्णु ने वाराह अवतार लेकर पृथ्वी को रसातल से निकाला था। यह मुख ‘पृथ्वी तत्त्व’ और मूलाधार चक्र की स्थिरता का प्रतीक है। कुण्डलिनी योग में सबसे बड़ी चुनौती ऊर्जा को स्थिर रखना है। यदि नींव (मूलाधार) सुदृढ़ नहीं होगी, तो ऊर्जा का विस्फोट साधक को मानसिक रूप से विक्षिप्त कर सकता है। वाराह मुख साधक को धैर्य, सहनशक्ति और स्थिरता प्रदान करता है। यह इंगित करता है कि आध्यात्मिक ऊँचाइयों को छूने के लिए जड़ों का गहरा होना अनिवार्य है। यह मुख अपान वायु पर नियंत्रण का भी संकेत देता है, जिसकी चर्चा हम आगे करेंगे।

५. ऊर्ध्व मुख: हयग्रीव – ज्ञान एवं जल/शून्य तत्त्व

ऊपर की ओर देखने वाला हयग्रीव (घोड़े का मुख) ज्ञान, विद्या और वेदों का प्रतीक है। घोड़ा गति और शक्ति का चिह्न है, किन्तु हयग्रीव रूप में यह ‘शुद्ध विद्या’ है। कुछ तंत्र ग्रंथों में इसे जल तत्त्व से भी जोड़ा जाता है (क्योंकि हयग्रीव ने मधु-कैटभ का वध कर वेदों को जल से निकाला था), किन्तु उच्चतर योग में यह ‘चिदाकाश’ या सहस्रार चक्र की ओर संकेत करता है। यह वह अवस्था है जहाँ शब्द, अर्थ और ज्ञान एक हो जाते हैं। यह मुख साधक को ‘परा-वाक्’ की सिद्धि देता है और अज्ञान रूपी अंधकार को काटकर उसे आत्म-साक्षात्कार के प्रकाश से भर देता है।

प्राण विद्या और पंचमुखी हनुमान: पंचप्राणों पर नियंत्रण का विज्ञान

उपनिषदों में कहा गया है—“प्राणो वै बलम्” (प्राण ही बल है)। हनुमान जी को ‘पवनपुत्र’ कहा जाता है, जिसका लाक्षणिक अर्थ है—प्राण का पुत्र या प्राण का स्वामी। योग चूड़ामणि उपनिषद और हठयोग प्रदीपिका जैसे ग्रंथों के अनुसार, हमारा स्थूल शरीर प्राण के अधीन है और प्राण मन के अधीन। हनुमान जी ‘मनोजवम्’ (मन की गति वाले) हैं, जिसका अर्थ है कि उन्होंने प्राण और मन दोनों को जीत लिया है। पंचमुखी हनुमान का स्वरूप वस्तुतः शरीर के भीतर कार्य कर रहे पाँच मुख्य प्राणों (पंचप्राण) के पूर्ण नियंत्रण और एकीकरण (Integration) का ही रूपक है। कुण्डलिनी जागरण के लिए इन पाँचों वायुओं का सधना अनिवार्य है।

आइए, पंचप्राणों के गूढ़ विज्ञान और पंचमुखी स्वरूप के अंतर्संबंध का विश्लेषण करें:

१. प्राण वायु और वानर मुख (हृदय प्रदेश)

‘प्राण वायु’ का स्थान हृदय से लेकर कंठ तक माना गया है। यह श्वास को अंदर लेने (Inhalation) और जीवन शक्ति के अवशोषण के लिए उत्तरदायी है। पूर्व मुखी हनुमान (वानर मुख) सीधे तौर पर ‘मुख्य प्राण’ से संबंधित हैं। हनुमान जी का हृदय सदैव राम (परम चेतना) के लिए स्पंदित होता है। योग में, जब साधक पूरक (Inhalation) करता है, तो वह ब्रह्मांडीय ऊर्जा को अपने भीतर भर रहा होता है। वानर मुख इस बात का प्रतीक है कि साधक को प्रत्येक श्वास के साथ दिव्यता को ग्रहण करना चाहिए। यदि प्राण वायु असंतुलित हो, तो मन चंचल रहता है, जिसे हनुमान जी की भक्ति और ध्यान द्वारा स्थिर किया जाता है।

२. अपान वायु और वाराह मुख (मूलाधार/गुदा प्रदेश)

‘अपान वायु’ का स्थान नाभि से नीचे, मूलाधार और गुदा क्षेत्र में है। इसका कार्य मल-मूत्र विसर्जन और नीचे की ओर गति करना है। कुण्डलिनी जागरण में सबसे महत्वपूर्ण क्रिया है—अपान वायु की अधोगति को रोककर उसे ऊर्ध्वगामी बनाना। वाराह मुख (उत्तर दिशा) इसी प्रक्रिया का द्योतक है। जिस प्रकार वाराह भगवान ने पृथ्वी को रसातल (नीचे) से ऊपर उठाया, उसी प्रकार साधक को ‘मूलबंध’ लगाकर अपान वायु को ऊपर उठाना होता है। जब अपान वायु ऊपर उठती है और प्राण वायु से मिलती है, तो नाभि केंद्र में प्रचंड ऊर्जा उत्पन्न होती है जो कुण्डलिनी को जागृत करती है। वाराह मुख की साधना अपान वायु की शुद्धि और ऊर्ध्वगमन की कुंजी है।

३. समान वायु और नृसिंह मुख (नाभि प्रदेश)

‘समान वायु’ का स्थान नाभि क्षेत्र में है। यह जठराग्नि को प्रज्वलित करती है और भोजन को पचाकर रस को पूरे शरीर में वितरित करती है। यह प्राण और अपान के मिलन का बिंदु है। नृसिंह मुख (दक्षिण दिशा), जो अग्नि तत्त्व का प्रतीक है, समान वायु का अधिष्ठाता है। नृसिंह भगवान ने हिरण्यकशिपु का वध देहरी (Threshold) पर किया था—जो संधिकाल और संधिस्थान का प्रतीक है। उसी प्रकार, समान वायु प्राण और अपान की संधि है। नृसिंह मुख की उग्रता उस पाचन अग्नि (Digestive Fire) और ज्ञान अग्नि का प्रतीक है जो समस्त द्वैत भाव को भस्म कर देती है। समान वायु के संतुलन से ही साधक का शरीर तेजस्वी बनता है और कुण्डलिनी के लिए मार्ग प्रशस्त होता है।

४. उदान वायु और हयग्रीव मुख (कंठ से शीर्ष तक)

‘उदान वायु’ का स्थान कंठ और मस्तिष्क है। यह वायु प्राण को शरीर से बाहर ले जाने (मृत्यु के समय) या समाधि की अवस्था में चेतना को उच्च लोकों में ले जाने का कार्य करती है। हयग्रीव मुख (ऊर्ध्व दिशा) उदान वायु का प्रतीक है। कुण्डलिनी जब जागृत होकर सुषुम्ना मार्ग से ऊपर चढ़ती है, तो उदान वायु ही उसे विशुद्धि चक्र से आज्ञा चक्र और सहस्रार तक ले जाती है। हयग्रीव ज्ञान के देवता हैं, और उदान वायु का संबंध भी उच्च बौद्धिक क्षमताओं और आध्यात्मिक अनुभूतियों से है। जब साधक ‘उड्डीयान बंध’ और ‘जालंधर बंध’ का अभ्यास करता है, तो वह उदान वायु को सिद्ध कर रहा होता है, जिससे गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध ऊर्ध्वगमन संभव होता है।

५. व्यान वायु और गरुड़ मुख (संपूर्ण शरीर)

‘व्यान वायु’ संपूर्ण शरीर में व्याप्त है। यह रक्त संचार, नाड़ी तंत्र और ऊर्जा के वितरण का कार्य करती है। गरुड़ मुख (पश्चिम दिशा) व्यान वायु का प्रतिनिधित्व करता है। गरुड़ के पंख विशाल हैं और उनकी गति अबाध है, ठीक उसी प्रकार व्यान वायु शरीर के रोम-रोम में प्राण का संचार करती है। कुण्डलिनी जागरण के दौरान जब ऊर्जा का तीव्र प्रवाह होता है, तो व्यान वायु ही उस ऊर्जा को सुरक्षित रूप से पूरे शरीर में वितरित (Distribute) करती है। यदि व्यान वायु कमजोर हो, तो साधक को शारीरिक व्याधियां घेर लेती हैं। गरुड़ मुख का ध्यान ‘विष’ (अशुद्धियों) को नष्ट कर नाड़ियों को शुद्ध करता है, जिससे व्यान वायु का प्रवाह निर्बाध होता है।

अहिरावण वध: पंचप्राणों के एकीकरण का रूपक

रामायण में कथा आती है कि अहिरावण का वध करने के लिए हनुमान जी को पाँच अलग-अलग दिशाओं में जल रहे पाँच दीपकों को एक साथ बुझाना पड़ा। आध्यात्मिक दृष्टि से, ये पाँच दीपक हमारी पाँचों ज्ञानेंद्रियाँ (Senses) और पाँचों प्राणों की बहिर्मुखी (Outward) प्रवृत्तियां हैं। अहिरावण हमारा ‘अहंकार’ है, जो पाताल (अवचेतन मन/Subconscious Mind) में छिपा है।

साधारण अवस्था में हमारे प्राण और इंद्रियाँ बिखरे हुए होते हैं—आँखें रूप में, कान शब्द में, प्राण सांसारिक गतिविधियों में। जब तक ये ‘दीपक’ अलग-अलग दिशाओं में जल रहे हैं, अर्थात ऊर्जा बिखरी हुई है, तब तक अज्ञान रूपी अहिरावण नहीं मर सकता। हनुमान जी द्वारा पंचमुखी रूप धारण करना ‘प्रत्याहार’ और ‘धारणा’ की अवस्था है। पाँचों दीपकों को एक साथ बुझाना (यानि श्वास का निरोध – केवल कुम्भक) प्राणों को सुषुम्ना में एक साथ प्रवाहित करने का प्रतीक है।

जब प्राण (हृदय), अपान (मूलाधार), समान (नाभि), उदान (कंठ) और व्यान (देह) एक लय में स्पंदित होते हैं, तभी ‘महाप्राण’ का उदय होता है। यही वह क्षण है जब कुण्डलिनी शक्ति, जो मूलाधार में साढ़े तीन फेरे लगाकर सो रही है, जाग्रत होती है और ब्रह्मरंध्र की ओर दौड़ती है। पंचमुखी हनुमान साधना का वास्तविक रहस्य यही है—बिखरे हुए अस्तित्त्व को समेटकर ‘एक’ कर देना।

निष्कर्ष एवं साधक के लिए संकेत

अतः, पंचमुखी हनुमान की उपासना को केवल भय-निवारण या रक्षा-कवच तक सीमित नहीं रखना चाहिए। यह एक उच्च कोटि की ‘प्राण विद्या’ है। एक गंभीर साधक के लिए, पंचमुखी विग्रह का ध्यान करते समय यह भावना करनी चाहिए कि वह अपनी चेतना के पाँचों स्तरों (पंचकोश) और पाँचों प्राणों को शुद्ध कर रहा है। वाराह मुख से स्थिरता (अपान जय), नृसिंह मुख से संकल्प शक्ति (समान जय), वानर मुख से प्रेम (प्राण जय), गरुड़ मुख से व्यापकता (व्यान जय) और हयग्रीव मुख से दिव्य ज्ञान (उदान जय) की याचना करनी चाहिए। जब इन शक्तियों का संतुलन सधता है, तभी साधक के भीतर का ‘राम’ (आत्मा) रावण और अहिरावण (माया और मोह) के बंधनों से मुक्त होता है।

यौगिक विज्ञान की दृष्टि से, पंचमुखी हनुमान का स्वरूप केवल एक पौराणिक आख्यान नहीं, अपितु मानव शरीर के भीतर सुप्त चेतना के जागरण का एक पूर्ण मानचित्र है। जब हम पंचप्राणों के संतुलन को समझ लेते हैं, तो अगला स्वाभाविक चरण ‘कुण्डलिनी शक्ति’ का ऊर्ध्वगमन होता है। हनुमान जी, जिन्हें ‘बजरंगबली’ (वज्र अंग वाले) कहा जाता है, वे स्वयं उस वज्र-नाड़ी (सुषुम्ना) के अधिष्ठाता हैं, जिसके माध्यम से कुण्डलिनी मूलाधार से सहस्रार तक की यात्रा करती है।

कुण्डलिनी शक्ति का उत्थान और पंचमुख: षट्चक्र भेदन में भूमिका

कुण्डलिनी जागरण की प्रक्रिया में साधक के समक्ष सबसे बड़ी बाधाएँ ‘ग्रन्थियाँ’ और ‘चित्त वृत्तियाँ’ होती हैं। मूलाधार में सोई हुई शक्ति जब जागृत होती है, तो उसे ब्रह्म ग्रन्थि, विष्णु ग्रन्थि और रुद्र ग्रन्थि का भेदन करना होता है। पंचमुखी हनुमान की उपासना इस प्रक्रिया में एक उत्प्रेरक (Catalyst) का कार्य करती है। यहाँ पाँच मुख, पाँच तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) के शुद्घिकरण का प्रतीक बनकर उभरते हैं, जो कुण्डलिनी के मार्ग को प्रशस्त करते हैं।

हनुमान के पाँच मुखों का चित्रण और उनके साथ जुड़े पाँच प्राणिक ऊर्जा केंद्र।
हनुमान के पाँच मुखों का चित्रण और उनके साथ जुड़े पाँच प्राणिक ऊर्जा केंद्र।

चित्र: सुषुम्ना नाड़ी में प्राणों के प्रवाह और पंचमुखी हनुमान द्वारा चक्रों के भेदन का प्रतीकात्मक चित्रण।

जब साधक पंचमुखी रूप का ध्यान करता है, तो वह वास्तव में अपने मेरुदण्ड में स्थित प्राणिक ऊर्जा को एक विशिष्ट दिशा दे रहा होता है। कुण्डलिनी शक्ति का स्वभाव सर्पिलाकार होता है, और उसे नियंत्रित करने के लिए ‘मारुति’ (वायु पुत्र) की शक्ति अनिवार्य है। हठयोग प्रदीपिका में स्पष्ट कहा गया है— “चले वाते चलं चित्तं निश्चले निश्चलं भवेत्” (जब प्राण वायु चलायमान होती है, तो चित्त चंचल होता है; प्राण के स्थिर होने पर चित्त स्थिर हो जाता है)। हनुमान जी इस प्राण वायु के स्वामी हैं।

षट्चक्र भेदन की प्रक्रिया में पंचमुखों का हस्तक्षेप

शरीर के सात चक्रों में से प्रत्येक चक्र किसी न किसी तत्व और मनोवैज्ञानिक ग्रन्थि से जुड़ा है। पंचमुखी हनुमान का प्रत्येक मुख, चक्रों में आने वाले अवरोधों को नष्ट करने में सक्षम है:

  • मूलाधार और स्वाधिष्ठान (पृथ्वी और जल तत्व): यहाँ साधक वासना, भय और असुरक्षा से ग्रसित होता है। हनुमान का वानर मुख (पूर्व), जो सूर्य (तेज) का प्रतीक है, मूलाधार में स्थित जड़ता (Tamoguna) को जलाकर राख करता है। यह मुख साधक को ‘ब्रह्मचर्य’ की शक्ति प्रदान करता है, जो कुण्डलिनी को ऊपर उठाने के लिए प्राथमिक ईंधन है।
  • मणिपुर चक्र (अग्नि तत्व): नाभि केंद्र में स्थित यह चक्र शक्ति और अहंकार का केंद्र है। यहाँ ऊर्जा का विस्फोट होता है। नरसिंह मुख (दक्षिण), जो उग्रता और अग्नि का प्रतीक है, इस चक्र को संतुलित करता है। यह साधक के भीतर के ‘अहंकार’ रूपी हिरण्यकश्यप का विदीर्ण करता है, जिससे ऊर्जा अहंकारी न होकर आत्मिक बन जाती है।
  • अनाहत चक्र (वायु तत्व): हृदय में स्थित यह चक्र भावनाओं का केंद्र है। गरुड़ मुख (पश्चिम) यहाँ की वायु को विषाक्तता से मुक्त करता है। कुण्डलिनी जब हृदय चक्र तक पहुँचती है, तो कई बार साधक भावुकता में फंस जाता है। गरुड़ मुख उस ‘विष’ को हर लेता है और प्राणों को ऊर्ध्वगामी बनाए रखता है।
  • विशुद्ध चक्र (आकाश तत्व): कंठ में स्थित यह चक्र अभिव्यक्ति का द्वार है। हयग्रीव मुख (ऊर्ध्व/आकाश) यहाँ ज्ञान और वाक् सिद्धि प्रदान करता है। कुण्डलिनी यहाँ पहुँचकर ‘नाद ब्रह्म’ में परिवर्तित होने लगती है।
  • आज्ञा और सहस्रार चक्र: यहाँ द्वैत समाप्त होता है। पंचमुखी स्वरूप का समग्र प्रभाव साधक को ‘रामायण’ (राम का आयन या मार्ग) की ओर ले जाता है, जो अंततः आत्म-साक्षात्कार है।

यौगिक रहस्य: हयग्रीव, नरसिंह, वराह और गरुड़ मुखों का विशिष्ट मनोवैज्ञानिक और प्राणिक प्रभाव

हनुमान जी का मूल वानर मुख तो सर्वविदित है, परन्तु अन्य चार मुख—नरसिंह, गरुड़, वराह और हयग्रीव—गहन तांत्रिक और मनोवैज्ञानिक रहस्यों को अपने भीतर समेटे हुए हैं। आधुनिक मनोविज्ञान जिसे ‘अवचेतन मन’ (Subconscious Mind) की जटिलता कहता है, योग उसे ‘संस्कारों’ और ‘कर्मों’ का जाल कहता है। पंचमुखी हनुमान के ये विशिष्ट मुख इन्हीं जटिलताओं को सुलझाने की कुंजियाँ हैं।

सहस्रार चक्र में पंचमुखी हनुमान का दर्शन और कुण्डलिनी जागरण की प्रतीकात्मक कला।
सहस्रार चक्र में पंचमुखी हनुमान का दर्शन और कुण्डलिनी जागरण की प्रतीकात्मक कला।

चित्र: पंचमुखी स्वरूप के चार विशिष्ट मुखों (नरसिंह, गरुड़, वराह, हयग्रीव) का विस्तृत कलात्मक विवरण और उनके संबंधित तत्वों का आभामंडल।

१. दक्षिण मुख: भगवान नरसिंह – भय का विनाश और मणिपुर चक्र की शुद्धि

दक्षिण दिशा यम (मृत्यु) की दिशा मानी जाती है। हनुमान जी का नरसिंह मुख इसी दिशा में दृष्टि रखता है। योगिक मनोविज्ञान में, ‘भय’ (Fear) सबसे बड़ी ग्रन्थि है जो मणिपुर चक्र को अवरुद्ध करती है। यह भय मृत्यु का हो सकता है, अपयश का हो सकता है, या अस्तित्व खोने का।

प्राणिक प्रभाव: नरसिंह मुख ‘समान वायु’ (Samana Vayu) को प्रभावित करता है। समान वायु पाचन और ऊर्जा के वितरण के लिए उत्तरदायी है। जब हम भयभीत होते हैं, तो हमारा ‘पेट में मरोड़’ उठना इसी वायु के विक्षोभ का परिणाम है। नरसिंह मुख की आराधना साधक की जठराग्नि को प्रदीप्त करती है और ‘अभय’ प्रदान करती है। यह मुख साधक को यह अनुभूति कराता है कि वह शरीर नहीं, अपितु अविनाशी आत्मा है।

मनोवैज्ञानिक प्रभाव: यह मुख ‘छाया व्यक्तित्व’ (Shadow Self) के साथ संघर्ष करने की शक्ति देता है। हमारे अवचेतन में दबी हुई आक्रामकता और क्रोध को नरसिंह ऊर्जा एक रचनात्मक दिशा (Creative sublimation) देती है।

२. पश्चिम मुख: भगवान गरुड़ – विष का हरण और व्यान वायु का विस्तार

पश्चिम दिशा वरुण (जल) और अस्त होते सूर्य की दिशा है। गरुड़, पक्षियों के राजा और भगवान विष्णु के वाहन हैं। हनुमान जी का गरुड़ मुख ‘महाविष’ नाशक माना जाता है। योग में ‘विष’ केवल रसायनिक जहर नहीं है, अपितु नकारात्मक विचार, ईर्ष्या, द्वेष और अतीत के कड़वे अनुभव भी मानसिक विष हैं।

प्राणिक प्रभाव: गरुड़ मुख का संबंध ‘व्यान वायु’ (Vyana Vayu) से है, जो संपूर्ण शरीर में व्याप्त है और रक्त संचार तथा तंत्रिका तंत्र (Nervous System) को नियंत्रित करती है। गरुड़ की शक्ति से नाड़ियों में आए अवरोध (Blockages) खुलते हैं। जिस प्रकार गरुड़ सर्पों को खाता है, उसी प्रकार यह मुख कुण्डलिनी जागरण के दौरान उत्पन्न होने वाली नकारात्मक ऊर्जाओं को सोख लेता है। इसे ‘असाध्य रोग निवारक’ भी माना जाता है क्योंकि यह प्राणमय कोष की शुद्धि करता है।

मनोवैज्ञानिक प्रभाव: यह मुख मानसिक कुंठाओं और डिप्रेशन (अवसाद) के विरुद्ध कार्य करता है। गरुड़ की उड़ान स्वतंत्रता का प्रतीक है; अतः यह साधक को संकीर्ण मानसिकता के पिंजरे से मुक्त कर विस्तृत चेतना (Expanded Consciousness) का अनुभव कराता है।

३. उत्तर मुख: भगवान वराह – कर्मों का उत्खनन और अपान वायु पर विजय

उत्तर दिशा कुबेर और स्थिरता की दिशा है। वराह अवतार ने पृथ्वी को रसातल (गहराई) से बाहर निकाला था। आध्यात्मिक रूप से, ‘रसातल’ हमारे अचेतन मन (Unconscious Mind) की वह गहराई है जहाँ हमारे प्रारब्ध कर्म छिपे होते हैं।

प्राणिक प्रभाव: वराह मुख का कार्यक्षेत्र ‘अपान वायु’ (Apana Vayu) है। अपान वायु की स्वाभाविक गति नीचे की ओर (मल-मूत्र विसर्जन, प्रजनन) होती है। योग का उद्देश्य अपान को ऊपर उठाकर प्राण में मिलाना है। वराह मुख की शक्ति उस भारी, तामसिक ऊर्जा को ऊपर उठाती है (Urdhva Gati)। यह साधक को स्थिरता और ओजस प्रदान करता है।

मनोवैज्ञानिक प्रभाव: यह मुख उन साधकों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है जो आध्यात्मिक मार्ग पर चलते हुए भी भौतिक बाधाओं (दरिद्रता, आलस्य, प्रमाद) से जूझ रहे हैं। वराह मुख ‘तितिक्षा’ (सहनशक्ति) और ‘धैर्य’ का संचार करता है। यह मन की उस अवस्था को ठीक करता है जहाँ व्यक्ति को लगता है कि वह परिस्थितियों के दलदल में धंसता जा रहा है। वराह शक्ति उसे वहां से ‘उद्धार’ (Lift up) करती है।

४. ऊर्ध्व मुख: भगवान हयग्रीव – ज्ञान का प्रकाश और उदान वायु का उत्कर्ष

आकाश की ओर देखता हुआ हयग्रीव मुख शुद्ध सत्व गुण का प्रतीक है। हयग्रीव को वेदों का उद्धारक और विद्या का देवता माना जाता है। जब कुण्डलिनी शक्ति विशुद्ध चक्र और आज्ञा चक्र की ओर बढ़ती है, तो उसे गुरु-तत्व की आवश्यकता होती है।

प्राणिक प्रभाव: यह मुख ‘उदान वायु’ (Udana Vayu) को नियंत्रित करता है। उदान वायु कंठ से सिर तक सक्रिय रहती है और उच्चतर चेतना के अनुभवों, स्वप्न और मृत्यु के समय जीवात्मा के गमन के लिए जिम्मेदार है। हयग्रीव मुख की उपासना से उदान वायु शुद्ध होती है, जिससे साधक को ‘वाक् सिद्धि’ प्राप्त होती है—यानी उसकी वाणी सत्य और प्रभावशाली हो जाती है।

मनोवैज्ञानिक प्रभाव: यह मुख प्रज्ञा (Intellect) और अंतर्ज्ञान (Intuition) के बीच का सेतु है। यह अविद्या (Ignorance) का नाश करता है। जिन साधकों को ध्यान में एकाग्रता की समस्या होती है या जो भ्रमित रहते हैं, उनके लिए हयग्रीव मुख ‘विवेक ख्याति’ (Discriminative Knowledge) प्रदान करता है। यह मन को तर्कातीत (Beyond Logic) सत्य को समझने की क्षमता देता है।

निष्कर्ष: पूर्णता का योग

इस प्रकार, पंचमुखी हनुमान की साधना केवल एक भक्तिमार्ग नहीं, अपितु एक अत्यंत परिष्कृत ‘महायोग’ है। यह पांचों प्राणों (प्राण, अपान, समान, व्यान, उदान) और पांचों तत्वों का ऐसा अद्भुत समन्वय है जो जीवात्मा को पशुता से देवत्व की ओर ले जाता है।

जब साधक पूर्व मुख से ब्रह्मचर्य, दक्षिण से निर्भयता, पश्चिम से विष-मुक्ति, उत्तर से कर्म-शुद्धि और ऊर्ध्व मुख से ज्ञान प्राप्त कर लेता है, तब उसके भीतर की कुण्डलिनी शक्ति निर्बाध रूप से सहस्रार में स्थित परम चेतना (राम) से मिलन करती है। यही पंचमुखी हनुमद् उपासना का परम लक्ष्य है— ‘आत्मनिवेदन’ से ‘आत्मसाक्षात्कार’ तक की यात्रा।


(अगले भाग में हम पंचमुखी हनुमान मंत्रों के ध्वन्यात्मक विज्ञान (Sonic Science) और उनके द्वारा नाड़ी शोधन की व्यावहारिक विधियों पर चर्चा करेंगे।)

साधना और सिद्धि: पंचमुखी हनुमान कवच और प्राणिक ऊर्जा के संतुलन हेतु प्रायोगिक निर्देश

सैद्धांतिक विवेचन से परे, जब हम साधना के धरातल पर उतरते हैं, तो पंचमुखी हनुमान का स्वरूप केवल एक पौराणिक आख्यान नहीं रह जाता, बल्कि यह ‘तन्त्र’ का एक अत्यंत शक्तिशाली यंत्र बन जाता है। जैसा कि हमने पूर्ववत चर्चा की, यह पाँच मुख केवल पाँच दिशाओं के रक्षक नहीं हैं, अपितु यह हमारे शरीर में विद्यमान पंचप्राणों (प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान) के अधिष्ठाता भी हैं। कुण्डलिनी जागरण की प्रक्रिया में इन प्राणों का संतुलन (होमियोस्टैसिस) अनिवार्य है। यदि प्राण अनियंत्रित हैं, तो शक्ति का जागरण साधक के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। अतः, पंचमुखी हनुमान कवच की साधना उस ‘सुरक्षा घेरे’ का कार्य करती है, जिसके भीतर साधक निर्भय होकर अपनी सुषुम्ना नाड़ी में प्राण का संचार कर सकता है।

यहाँ हम इस साधना की गूढ़ विधियों और प्राणिक ऊर्जा के संतुलन हेतु प्रायोगिक निर्देशों का विस्तार से वर्णन करेंगे। यह विधियाँ वैदिक ऋचाओं और आगम शास्त्रों के मर्म पर आधारित हैं।

साधना की पूर्वपीठिका: संकल्प और आसन

हनुमत साधना में ‘शुचिता’ और ‘ब्रह्मचर्य’ प्रथम सोपान हैं। यह साधना केवल बाह्य कर्मकांड नहीं है, अपितु यह एक आंतरिक यज्ञ है। साधक को चाहिए कि वह मंगलवार या शनिवार को ब्रह्म मुहूर्त में (सूर्योदय से 96 मिनट पूर्व) उठकर स्नान आदि से निवृत्त हो।

आसन और दिशा: कुण्डलिनी जागरण के उद्देश्य से की जाने वाली इस साधना के लिए ‘सिद्धासन’ या ‘पद्मासन’ सर्वोत्तम है, क्योंकि ये आसन मूलाधार चक्र पर स्वाभाविक दबाव बनाते हैं। साधक का मुख पूर्व दिशा (हनुमान मुख) या उत्तर दिशा (वराह मुख) की ओर होना चाहिए। लाल रंग के ऊनी आसन का प्रयोग ऊर्जा के संरक्षण (Insulation) के लिए श्रेयस्कर है।

पंचमुखी कवच का यौगिक विनियोग

सामान्यतः लोग कवच का पाठ रक्षा के लिए करते हैं, परन्तु एक योगी के लिए कवच ‘न्यास’ की प्रक्रिया है। न्यास का अर्थ है—देवत्व को अपने अंगों में स्थापित करना। पंचमुखी हनुमान कवच का पाठ करते समय साधक को यह भाव करना चाहिए कि वह अपने स्थूल शरीर को दिव्य अग्नि से आच्छादित कर रहा है।

जब आप कवच के मंत्रों का उच्चारण करें, तो नाद (ध्वनि) के कम्पन को सम्बंधित चक्रों पर अनुभव करना आवश्यक है। यह केवल जिह्वा का विषय नहीं है, बल्कि ‘नादब्रह्म’ का प्रयोग है।

प्राणिक ऊर्जा संतुलन: पंचमुखी ध्यान विधि

यह इस लेख का सबसे महत्वपूर्ण भाग है। यहाँ हम पंचप्राणों को संतुलित करने के लिए विशिष्ट ध्यान विधि का वर्णन कर रहे हैं। इस प्रक्रिया में विजुअलाइजेशन (मानस-दर्शन) की भूमिका अहम है।

[IMAGE_PLACEHOLDER_4]

ध्यान के समय मेरुदंड (Spine) को सीधा रखें और नेत्र बंद कर भ्रूमध्य (आज्ञा चक्र) में अपना ध्यान केंद्रित करें। अब मानसिक रूप से पंचमुखों का आवाहन करें:

  1. पूर्व मुख (वानर – मुख्य प्राण): सर्वप्रथम अपने हृदय आकाश में वानर मुख का ध्यान करें। यह सूर्य के समान तेजस्वी है। श्वास लेते समय अनुभव करें कि ‘प्राण वायु’ (जो श्वसन और हृदय का संचालन करती है) स्वर्ण आभा के रूप में आपके हृदय चक्र को भर रही है। मन में “ॐ हरिमर्कट मर्कटाय स्वाहा” का मानसिक जप करें। यह आपके आत्मविश्वास को बढ़ाता है और हृदय ग्रंथि का भेदन करता है।
  2. दक्षिण मुख (नरसिंह – समान और अपान): अब ध्यान को नाभि और मूलाधार की ओर ले जाएं। भगवान नरसिंह का उग्र स्वरूप, जो भयनाशक है, उसे दक्षिण दिशा से अपनी रक्षा करते हुए देखें। यह ‘समान वायु’ (पाचन) और ‘अपान वायु’ (उत्सर्जन) को नियंत्रित करता है। नरसिंह की गर्जना का अनुभव मूलाधार में करें, जो सुप्त कुण्डलिनी को जगाने के लिए ‘आघात’ का कार्य करती है। मंत्र: “ॐ नमो भगवते पंचवदनाय दक्षिणमुखाय कराळवदनाय नृसिंहाय…”। यह साधक के भीतर के काम और क्रोध रूपी मलों को जलाकर भस्म कर देता है।
  3. पश्चिम मुख (गरुड़ – व्यान): गरुड़ का सम्बन्ध ‘व्यान वायु’ से है, जो सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त है और रक्त संचार को नियंत्रित करती है। गरुड़ विष नाशक हैं। साधना के दौरान उत्पन्न होने वाले किसी भी प्रकार के ‘विष’ (नकारात्मक ऊर्जा या शारीरिक व्याधि) को गरुड़ मुख द्वारा चूसे जाते हुए देखें। अनुभव करें कि आपके रोम-रोम में विद्युत प्रवाह (Electricity) दौड़ रहा है। यह पक्ष कुण्डलिनी को ऊपर उठने के लिए मार्ग (सुषुम्ना) को साफ करता है।
  4. उत्तर मुख (वराह – उदान): वराह भगवान ने पृथ्वी को रसातल से निकाला था। यौगिक भाषा में, यह ‘उदान वायु’ का प्रतीक है, जो ऊर्जा को ऊपर की ओर (ऊर्ध्वरेता) ले जाती है। कंठ कूप (विशुद्धि चक्र) पर ध्यान केंद्रित करें। वराह मुख का ध्यान करते हुए संकल्प लें कि आपकी चेतना निम्न स्तर से उठकर उच्च स्तर की ओर जा रही है। यह भौतिक और आध्यात्मिक सम्पदा का प्रदाता है।
  5. ऊर्ध्व मुख (हयग्रीव – ज्ञान/सहस्रार): अंत में, अपना ध्यान सिर के ऊपरी भाग (सहस्रार चक्र) पर ले जाएं। हयग्रीव स्वरूप, जो कि शुद्ध स्फटिक के समान श्वेत है, ज्ञान का प्रतीक है। जब कुण्डलिनी शक्ति मूलाधार से उठकर यहाँ पहुँचती है, तो साधक को ‘ऋतम्भरा प्रज्ञा’ की प्राप्ति होती है। यहाँ केवल शांति और मौन है।

साधना में आने वाले अवरोध और निवारण

कुण्डलिनी जागरण के प्रयास में जब प्राण उग्र होता है, तो साधक को शरीर में कम्पन, अत्यधिक गर्मी, या भय का अनुभव हो सकता है। पंचमुखी हनुमान की साधना में सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसमें ‘रक्षा’ का तत्व अंतर्निहित है। यदि ऊर्जा अनियंत्रित होने लगे, तो साधक को तत्काल दक्षिण मुखी नरसिंह और पश्चिम मुखी गरुड़ का स्मरण करना चाहिए। यह उग्र ऊर्जा को सौम्य बनाकर शरीर में पुनः वितरित (Channelize) कर देते हैं। इसे शास्त्रों में ‘शक्तिपात’ का सुरक्षित अवतरण कहा गया है।

नियमित रूप से पंचमुखी हनुमान कवच का 11 बार पाठ और उपरोक्त ध्यान विधि का 41 दिनों तक अभ्यास करने से साधक के प्राणमय कोश में अभूतपूर्व परिवर्तन होते हैं। उसकी आभा (Aura) विस्तृत हो जाती है और वाणी में ‘वाकसिद्धि’ का प्रभाव आने लगता है।

निष्कर्ष (उपसंहार)

पंचमुखी हनुमान का स्वरूप केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं, अपितु मानव चेतना के विकास का एक पूर्ण विज्ञान है। यह भक्ति और योग का एक दुर्लभ संगम है। जहाँ भक्ति साधक को अहंकार शून्य करती है, वहीं योग (प्राण विद्या) उसे समर्थ बनाता है। कुण्डलिनी जागरण की यात्रा में पंचमुखी स्वरूप, पंचतत्वों और पंचप्राणों का शोधन कर, जीवात्मा को परमात्मा से मिलाने वाला ‘सेतु’ है।

वर्तमान समय में, जब मानसिक तनाव और आत्मिक भटकाव चरम पर है, पंचमुखी हनुमान की यह साधना संजीवनी बूटी के समान है। यह न केवल भौतिक बाधाओं को हरती है, बल्कि साधक को मोक्ष के द्वार तक सुरक्षित ले जाती है। आवश्यकता है तो केवल अटूट श्रद्धा, सही विधि और निरंतर अभ्यास की। जैसा कि तुलसीदास जी ने कहा है— “कवन सो काज कठिन जग माहीं, जो नहिं होइ तात तुम पाहीं।” अर्थात, जब प्राणशक्ति (हनुमान) जागृत हो जाती है, तो इस जगत में कोई भी कार्य या सिद्धि असंभव नहीं रहती।

साधक को चाहिए कि वह इस गूढ़ ज्ञान को गुरु के सानिध्य में ही प्रयोग में लाए, क्योंकि शक्ति का अर्जन जितना कठिन है, उसका सही प्रबंधन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। पंचमुखी हनुमान की कृपा से आपकी आध्यात्मिक यात्रा निर्विघ्न संपन्न हो, यही हमारी कामना है।


लेखक के बारे में

आचार्य डॉ. वागीश शास्त्री (वैदिक एवं तन्त्र मर्मज्ञ)

आचार्य वागीश शास्त्री विगत ३० वर्षों से भारतीय प्राच्य विद्या, योग और तन्त्र शास्त्र के अध्ययन और अध्यापन में संलग्न हैं। वाराणसी की विद्वत परंपरा से जुड़े डॉ. शास्त्री ने ‘हनुमत रहस्य’ और ‘कुण्डलिनी विज्ञान’ पर गहन शोध किया है। उनका उद्देश्य वैदिक विज्ञान के गूढ़ रहस्यों को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में सरल भाषा में जनमानस तक पहुँचाना है, ताकि साधक अंधविश्वास से बचकर शुद्ध आध्यात्मिकता का अनुभव कर सकें।

सम्बंधित लेख

॥ इति शुभम् ॥

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *