Adhyatmik Katha





हनुमान शाबर मंत्र विश्लेषण

हनुमान शाबर मंत्र: आध्यात्मिक साधना, सिद्ध प्रयोग एवं अनिवार्य सावधानियों का विस्तृत विश्लेषण

भारतीय अध्यात्म की विशाल और रहस्यमयी परंपरा में मंत्र विज्ञान का स्थान सर्वोपरि है। मंत्रों की दुनिया में ‘शाबर मंत्र’ अपनी सरलता, सहजता और तीव्र प्रभाव के लिए जाने जाते हैं। विशेष रूप से कलयुग के जाग्रत देवता माने जाने वाले भगवान हनुमान की उपासना में शाबर मंत्रों का प्रयोग अत्यंत फलदायी माना गया है। वैदिक मंत्रों की क्लिष्टता और तांत्रिक मंत्रों की जटिल विधियों से इतर, शाबर मंत्र जनसामान्य की भाषा में रचे गए वे अमोघ अस्त्र हैं, जो श्रद्धा और विश्वास के धरातल पर तत्काल परिणाम देने की क्षमता रखते हैं।

शाबर मंत्रों का उद्भव और गुरु गोरखनाथ की परंपरा: एक शास्त्रीय विमर्श

शाबर मंत्रों के उद्भव की कथा और इनका ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य अत्यंत रोचक है। ‘शाबर’ शब्द की व्युत्पत्ति और अर्थ को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं, किंतु सर्वमान्य रूप से इसका संबंध ‘शबर’ जाति (वनवासी या आदिवासी संस्कृति) से माना जाता है। यह इस बात का संकेत है कि ये मंत्र अभिजात्य संस्कृत व्याकरण के नियमों से मुक्त, लोकभाषा और वनवासियों की सहज पुकार से जन्मे हैं।

भगवान शिव और माता पार्वती का संवाद

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, शाबर मंत्रों के आदि प्रवर्तक भगवान शिव हैं। कहा जाता है कि कलयुग के आगमन से पूर्व, माता पार्वती ने भगवान शिव से प्रश्न किया कि कलयुग में जब मनुष्य की क्षमताएं क्षीण हो जाएंगी, संस्कृत का ज्ञान लुप्तप्राय हो जाएगा और वैदिक अनुष्ठानों की शुद्धता बनाए रखना कठिन होगा, तब कल्याण का मार्ग क्या होगा? उत्तर में भगवान शिव ने ‘शाबर मंत्रों’ की रचना की। उन्होंने वैदिक मंत्रों को ‘कीलित’ (Lock) कर दिया ताकि उनका दुरुपयोग न हो सके और शाबर मंत्रों को जागृत किया जो बिना विस्तृत कर्मकांड के सिद्ध हो सकें।

ध्यान मुद्रा में भगवान हनुमान की दिव्य प्रतिमा और आध्यात्मिक प्रकाश पुंज।


ध्यान मुद्रा में भगवान हनुमान की दिव्य प्रतिमा और आध्यात्मिक प्रकाश पुंज।

नाथ संप्रदाय और गुरु गोरखनाथ का योगदान

यद्यपि इन मंत्रों का मूल शिव में है, तथापि इन्हें व्यवस्थित करने, लिपिबद्ध करने और समाज में स्थापित करने का श्रेय ‘नाथ संप्रदाय’ को जाता है। 84 सिद्धों और 9 नाथों की परंपरा में गुरु मत्स्येंद्रनाथ और उनके शिष्य गुरु गोरखनाथ (गोरक्षनाथ) का स्थान सर्वोच्च है। गुरु गोरखनाथ ने ही बिखरे हुए लोक मंत्रों को एक सूत्र में पिरोया।

गोरखनाथ जी ने अनुभव किया कि जनसामान्य संस्कृत के भारी-भरकम श्लोकों का उच्चारण सही ढंग से नहीं कर पाता। त्रुटिपूर्ण उच्चारण से या तो मंत्र निष्फल हो जाते थे या विपरीत परिणाम देते थे। अतः उन्होंने तत्कालीन लोकभाषाओं (जैसे- पुरानी हिंदी, अवधी, ब्रज, राजस्थानी, मैथिली आदि) में मंत्रों का संस्कार किया।

“ॐ गुरुजी, सत नमः आदेश। गुरुजी को आदेश। ॐ कारे शिव-रुपी, मध्य देशे गो-रुपी…”

उपर्युक्त पंक्तियाँ प्रायः शाबर मंत्रों के प्रारंभ में मिलती हैं, जो गुरु सत्ता के प्रति समर्पण को दर्शाती हैं। नाथ परंपरा का मानना है कि शाबर मंत्रों की शक्ति ‘शब्द’ में नहीं, बल्कि उस ‘आदेश’ और ‘शपथ’ में निहित है जो साधक अपने इष्ट को देता है। इसीलिए, हनुमान शाबर मंत्रों में गुरु गोरखनाथ की दुहाई का विशेष महत्व है। यह माना जाता है कि इन मंत्रों को स्वयं शिव ने ‘अमोघ’ होने का वरदान दिया है, और गुरु गोरखनाथ ने इन्हें सिद्ध करके चैतन्य किया है।

हनुमान शाबर मंत्रों की भाषिक संरचना एवं मनोवैज्ञानिक प्रभाव

हनुमान शाबर मंत्रों की संरचना वैदिक ऋचाओं से पूरी तरह भिन्न है। इनका विश्लेषण करने पर हम पाते हैं कि ये भाषाई विज्ञान और मानव मनोविज्ञान का एक अद्भुत मिश्रण हैं।

भाषिक संरचना: व्याकरण से परे, भाव के निकट

शाबर मंत्रों की भाषा को ‘संध्या भाषा’ या ‘ग्राम्य भाषा’ कहा जा सकता है। इनमें व्याकरण के नियमों की अवहेलना स्पष्ट दिखाई देती है, किंतु यही इनकी शक्ति भी है।

  • मिश्रित शब्दावली: इन मंत्रों में संस्कृत के बीज मंत्रों (जैसे- ॐ, ह्रीं, क्लीं) के साथ-साथ हिंदी, उर्दू, फारसी और देशज शब्दों का अनूठा मिश्रण होता है। उदाहरण के लिए, “हनुमान पहलवान”, “हंकारी”, “ललकारी” जैसे शब्दों का प्रयोग हनुमान जी के वीर रस को जगाने के लिए किया जाता है।
  • आदेशात्मक स्वर (Imperative Tone): वैदिक मंत्रों में प्रायः स्तुति या प्रार्थना का भाव होता है (जैसे- “हम आपकी शरण में हैं”), जबकि शाबर मंत्रों में देवता को कार्य करने के लिए ‘आदेश’ दिया जाता है या ‘चुनौती’ दी जाती है।
  • ‘आन’ और ‘दुहाई’ (The Concept of Oath): यह शाबर मंत्रों का सबसे विशिष्ट भाषाई तत्व है। साधक देवता को उनके सबसे प्रिय जनों की सौगंध देता है। हनुमान शाबर मंत्रों में प्रायः “दुहाई राम की”, “दुहाई सीता मैया की”, “दुहाई गुरु गोरखनाथ की” जैसे वाक्यों का प्रयोग होता है।

मनोवैज्ञानिक प्रभाव और कार्यप्रणाली

मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से, शाबर मंत्र साधक के अवचेतन मन (Subconscious Mind) को तीव्रता से प्रभावित करते हैं।

  1. आत्मविश्वास का संचार: जब साधक ‘दुहाई’ देता है, तो वह प्रार्थना की दीन-हीन अवस्था से ऊपर उठकर एक अधिकारपूर्ण स्थिति में आ जाता है। यह मनोवैज्ञानिक बदलाव साधक के संकल्प (Willpower) को इतना दृढ़ कर देता है कि ऊर्जा का प्रवाह तीव्र हो जाता है।
  2. इष्ट के साथ सीधा संवाद: लोकभाषा में होने के कारण साधक को मंत्र का अर्थ रटने की आवश्यकता नहीं होती। वह जो बोल रहा है, उसे सीधे महसूस करता है। यह ‘भाव’ ही मंत्र को चेतन करता है।
  3. भय मुक्ति: हनुमान शाबर मंत्रों में प्रयुक्त शब्दावली अत्यंत उग्र और रक्षक प्रकृति की होती है (जैसे- “भूत-प्रेत को मार”, “डाकिनी को पछाड़”)। इन शब्दों का उच्चारण साधक के मन से अज्ञात भय को तत्काल निकाल देता है।

प्रमुख हनुमान शाबर मंत्र और उनके सिद्ध प्रयोग

हनुमान जी के शाबर मंत्र विभिन्न उद्देश्यों के लिए प्रयोग किए जाते हैं—रक्षा, रोग निवारण, शत्रु बाधा निवारण और कार्य सिद्धि। यहाँ कुछ सात्विक और जन-कल्याणकारी प्रयोगों का वर्णन किया जा रहा है।

1. सर्व कार्य सिद्धि एवं रक्षा मंत्र

यह मंत्र अत्यंत लोकप्रिय है और इसका प्रयोग जीवन की बाधाओं को दूर करने और सुरक्षा घेरा बनाने के लिए किया जाता है।

“ॐ हनुमान पहलवान, बरसता लोहे का पान।
आगे चले जोरा जोरा, पीछे चले जोरा जोरा।
डाकिनी काटे, साकिनी काटे, काटे वन का फेरा।
लोहे की चौकी, वज्र का किवाड़,
जहां बैठे वज्र का घाड़ा।
राजा की सभा में, प्रजा की सभा में, दुहाई गुरु गोरखनाथ की।
मेरी भक्ति, गुरु की शक्ति, फुरो मंत्र ईश्वरो वाचा।”

प्रयोग विधि:

  • इस मंत्र को सिद्ध करने के लिए ग्रहण काल, होली, दीपावली या किसी भी मंगलवार का चयन करें।
  • लाल वस्त्र धारण करें और हनुमान जी को सिन्दूर, चमेली का तेल और लड्डू अर्पित करें।
  • रुद्राक्ष या मूंगे की माला से 108 बार (एक माला) जाप करें।
  • सिद्ध होने के बाद, जब भी आवश्यकता हो, 7 बार मंत्र पढ़कर अपनी छाती पर फूंक मारने से सुरक्षा प्राप्त होती है।

2. रोग और पीड़ा निवारण (झाड़ा) मंत्र

शारीरिक व्याधियों और नजर दोष को दूर करने के लिए इस मंत्र का प्रयोग ग्रामीण अंचलों में बहुतायत से होता है।

“ॐ नमो आदेश गुरु को।
वन में बैठी वानरी, फाड़े खाय।
ऊपर झाड़े, नीचे झाड़े, सब रोग मिटाय।
आधा सीसी, पूरा सीसी, कंठमाला जाय।
दुहाई अंजनी पुत्र की, दुहाई राम की।
मेरी भक्ति गुरु की शक्ति, फुरो मंत्र ईश्वरो वाचा।”

प्रयोग विधि:

  • मोर पंख या नीम की टहनी लेकर रोगी के सिर से पैर तक झाड़ा लगाते हुए इस मंत्र का 21 बार उच्चारण करें।
  • अंतिम उच्चारण के बाद रोगी के माथे पर भभूत (विभूति) लगाएं।
  • यह प्रक्रिया लगातार 3 दिन (मंगलवार, बुधवार, गुरुवार) करने से विशेष लाभ मिलता है।

साधना में अनिवार्य सावधानियां एवं नियम

शाबर मंत्रों की प्रकृति ‘उग्र’ और ‘त्वरित’ होती है। यद्यपि ये सरल हैं, तथापि इनके प्रयोग में सावधानी हटी तो दुर्घटना घटी वाली स्थिति हो सकती है। हनुमान जी ब्रह्मचारी और अत्यंत अनुशासित देवता हैं, अतः उनकी साधना में पवित्रता सर्वोच्च प्राथमिकता है।

1. सात्विकता और पवित्रता (Purity)

हनुमान शाबर मंत्र की साधना के दौरान साधक को मन, वचन और कर्म से पूर्ण सात्विक होना चाहिए।

  • ब्रह्मचर्य: साधना काल में पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन अनिवार्य है। केवल शारीरिक ही नहीं, मानसिक ब्रह्मचर्य भी आवश्यक है।
  • आहार: मांस, मदिरा, अंडा, प्याज, लहसुन और तामसिक भोजन का पूर्ण त्याग करना चाहिए। साधना के दिनों में एक समय भोजन करना और भूमि पर शयन करना श्रेष्ठ माना गया है।
  • स्त्री सम्मान: साधक को पराई स्त्री को माता समान मानना चाहिए। हनुमान जी को यह आचरण सर्वाधिक प्रिय है।

2. गुरु का मार्गदर्शन

यद्यपि शाबर मंत्र ‘स्वयं सिद्ध’ माने जाते हैं, फिर भी गुरु परंपरा का सम्मान आवश्यक है।

  • मंत्र जाप से पूर्व “ॐ गुरुजी, सत नमः आदेश” का उच्चारण अवश्य करें।
  • यदि आपके कोई देहधारी गुरु नहीं हैं, तो भगवान शिव या स्वयं हनुमान जी को गुरु मानकर मानसिक आज्ञा लेकर ही साधना प्रारंभ करें।

3. उच्चारण और भावना

शाबर मंत्रों में शब्दों का अर्थ भले ही स्पष्ट न हो, परंतु उनका उच्चारण वैसा ही करना चाहिए जैसा बताया गया है। शब्दों में फेरबदल न करें। साथ ही, ‘दुहाई’ देते समय मन में यह भाव होना चाहिए कि आप हनुमान जी को उनके प्रियजनों की सौगंध देकर विवश नहीं कर रहे, बल्कि अपने अधिकार और प्रेम से उन्हें बुला रहे हैं।

4. दुरुपयोग से बचें

शाबर मंत्रों का प्रयोग कभी भी किसी के अहित, वशीकरण (गलत उद्देश्य से) या मारण के लिए न करें। हनुमान जी ‘संकट मोचन’ हैं, वे संकट देने वाले का साथ नहीं देते। यदि इन मंत्रों का प्रयोग अनैतिक कार्य के लिए किया जाता है, तो इसकी ‘उलट मार’ (Backfire) साधक का सर्वनाश कर सकती है।

5. साधना काल और स्थान

  • साधना के लिए एकांत स्थान या हनुमान मंदिर सर्वश्रेष्ठ है।
  • घर में साधना करते समय ध्यान रखें कि कोई टोकने वाला न हो।
  • दीपक बुझना नहीं चाहिए। तेल का दीपक (चमेली या तिल का तेल) अखंड रूप से जलना चाहिए जब तक जाप चल रहा हो।

निष्कर्ष

हनुमान शाबर मंत्र भारतीय लोक-अध्यात्म की अनमोल धरोहर हैं। ये मंत्र इस सत्य के प्रमाण हैं कि ईश्वर भाषा या व्याकरण का नहीं, बल्कि भाव का भूखा है। गुरु गोरखनाथ द्वारा प्रतिष्ठित ये मंत्र आज भी उतने ही प्रासंगिक और शक्तिशाली हैं, जितने सदियों पूर्व थे।

एक आधुनिक साधक के लिए, इन मंत्रों का विश्लेषण यह सिखाता है कि जब पूर्ण समर्पण, अटूट विश्वास और मानसिक एकाग्रता (जो ‘दुहाई’ और ‘शपथ’ से उत्पन्न होती है) एक साथ मिलते हैं, तो असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं। आवश्यकता है तो बस हनुमान जी के चरणों में उस बाल-सुलभ विश्वास की, जो मानता है कि पुकारते ही ‘पवनपुत्र’ दौड़े चले आएंगे। अतः इन मंत्रों का प्रयोग जनकल्याण और आत्म-रक्षा के लिए ही करें, और हनुमान जी की कृपा के पात्र बनें।






Hanuman Shabar Mantra Blog Part 2

षटकर्म और हनुमान साधना: शांति, वशीकरण, और स्तंभन के सात्विक प्रयोग

हनुमान शाबर मंत्रों की दुनिया अत्यंत विशाल और रहस्यमयी है। नाथ संप्रदाय और सिद्धों द्वारा रचित ये मंत्र अपनी त्वरित फलदाई शक्ति के लिए जाने जाते हैं। तंत्र शास्त्र में ‘षटकर्म’ (छह प्रकार की क्रियाएं) का उल्लेख मिलता है, जिनमें शांति, वशीकरण, स्तंभन, विद्वेषण, उच्चाटन और मारण शामिल हैं। हालाँकि, हनुमान जी एक परम सात्विक और राम-भक्त देवता हैं। इसलिए, उनकी साधना में तामसिक प्रयोगों (जैसे मारण या विद्वेषण) का स्थान न के बराबर है और गृहस्थ साधकों के लिए ये पूर्णतः वर्जित हैं।

एक साधक के रूप में, हमें हनुमान जी की शक्तियों का उपयोग केवल जनकल्याण, आत्म-रक्षा और धर्म की स्थापना के लिए करना चाहिए। यहाँ हम षटकर्म के अंतर्गत आने वाले शांति, वशीकरण और स्तंभन के उन सात्विक प्रयोगों पर चर्चा करेंगे जो सामाजिक और पारिवारिक जीवन को सुगम बनाने में सहायक हैं।

प्राचीन पांडुलिपि और दीपक के साथ शाबर मंत्र साधना का पारंपरिक परिवेश।


प्राचीन पांडुलिपि और दीपक के साथ शाबर मंत्र साधना का पारंपरिक परिवेश।

1. शांति कर्म: गृह क्लेश और मानसिक संताप का निवारण

शांति कर्म का उद्देश्य जीवन में उत्पन्न उथल-पुथल को शांत करना है। आज के समय में, गृह क्लेश, मानसिक तनाव, और अकारण भय मनुष्य की सबसे बड़ी समस्याएं हैं। हनुमान शाबर मंत्रों के माध्यम से ‘शांति’ का अर्थ केवल सन्नाटा नहीं, बल्कि ‘सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह’ है।

सात्विक प्रयोग विधि:

  • गृह क्लेश निवारण: यदि घर में बिना कारण झगड़े होते हैं, तो यह नकारात्मक ऊर्जा का संकेत है। इसके लिए मंगलवार के दिन हनुमान जी के समक्ष चमेली के तेल का दीपक जलाएं। एक तांबे के लोटे में जल भरकर रखें और ‘हनुमान जंजीरा’ या किसी सिद्ध शाबर शांति मंत्र का 108 बार जाप करें। जाप के पश्चात उस जल (अभिमंत्रित जल) को पूरे घर में छिड़क दें। यह प्रयोग ‘शांति कर्म’ के अंतर्गत आता है जो घर के वास्तु दोष और नकारात्मक तरंगों को शांत करता है।
  • रोग शांति: शारीरिक व्याधियों की शांति के लिए हनुमान बाहुक या शाबर रोग नाशक मंत्रों का प्रयोग किया जाता है। यहाँ संकल्प ‘रोग की समाप्ति’ और ‘स्वास्थ्य की शांति’ का होना चाहिए।

“ॐ नमो आदेश गुरु को, हनुमान वीर, रखो हद धीर।
कष्ट मिटे, पाप कटे, विपत्ति जाए पीर।।
दुहाई गोरखनाथ की, दुहाई श्री राम की।।”

2. वशीकरण: आकर्षण का सात्विक स्वरूप (सम्मोहन और प्रेम)

‘वशीकरण’ शब्द सुनते ही अक्सर लोगों के मन में किसी को अपने नियंत्रण में करने का नकारात्मक विचार आता है। परन्तु आध्यात्मिक दृष्टि से, सात्विक वशीकरण का अर्थ है—‘सौहार्दपूर्ण संबंधों की स्थापना’। हनुमान साधना में इसका प्रयोग केवल टूटे हुए रिश्तों को जोड़ने, पति-पत्नी के बीच प्रेम बढ़ाने, या पथभ्रष्ट संतान को सही रास्ते पर लाने के लिए किया जाना चाहिए।

क्या करें और क्या न करें:

  • उद्देश्य की पवित्रता: कभी भी किसी पराई स्त्री या पुरुष को अनैतिक रूप से पाने के लिए हनुमान शाबर मंत्र का प्रयोग न करें। हनुमान जी ‘जितेंद्रिय’ हैं; गलत काम-भावना से किया गया जाप साधक के लिए विनाशकारी सिद्ध हो सकता है।
  • पारिवारिक वशीकरण (मोहन): यदि परिवार का कोई सदस्य (जैसे बेटा या पति/पत्नी) गलत संगत में पड़ गया है, तो उसे सन्मार्ग पर लाने के लिए ‘मोहन’ क्रिया का प्रयोग किया जाता है। इसके लिए सिंदूर का तिलक अभिमंत्रित करके उस व्यक्ति के माथे पर लगाने या उसका नाम लेकर जाप करने का विधान है।
  • सामाजिक प्रतिष्ठा (सर्वजन वशीकरण): यह प्रयोग समाज में मान-सम्मान पाने के लिए किया जाता है, ताकि आपकी वाणी में ओज आए और लोग आपकी बातों से प्रभावित हों। यह एक प्रकार का व्यक्तित्व विकास है जो मंत्र शक्ति से जागृत होता है।

3. स्तंभन: शत्रु बाधा और नकारात्मकता की रोकथाम

स्तंभन का शाब्दिक अर्थ है ‘रोक देना’ या ‘जड़ कर देना’। हनुमान साधना में इसका प्रयोग शत्रुओं के वार को रोकने, दुर्घटनाओं को टालने, या किसी बुरी आदत को जड़ से ख़त्म करने के लिए किया जाता है।

सात्विक प्रयोग विधि:

  • शत्रु स्तंभन: यदि कोई शत्रु अकारण आपको परेशान कर रहा हो, कोर्ट-कचहरी में झूठे मुकदमे चल रहे हों, तो शत्रु की बुद्धि को भ्रमित करने या उसकी गति को रोकने के लिए स्तंभन मंत्रों का प्रयोग होता है। इसमें शत्रु का ‘नाश’ नहीं माँगा जाता, बल्कि यह प्रार्थना की जाती है कि “वह मेरे प्रति शत्रुता का भाव भूल जाए” या “उसकी नकारात्मक क्रियाएं निष्फल हो जाएं”।
  • आत्म-स्तंभन: कई बार हमारा मन ही हमारा शत्रु होता है। काम, क्रोध, और लोभ की वृत्तियों को रोकने के लिए ‘आत्म-स्तंभन’ का प्रयोग किया जाता है। हनुमान जी के चरणों का ध्यान करते हुए अपनी चंचल वृत्तियों को रोकने का संकल्प लेना ही वास्तविक स्तंभन है।
  • रक्षा घेरा: साधना शुरू करने से पहले ‘शरीर कीलन’ या रक्षा घेरा बनाना भी स्तंभन का ही एक रूप है, जिससे बाहरी बाधाएं साधक को छू नहीं पातीं।

साधना काल में प्राणिक ऊर्जा का प्रबंधन (Pranic Energy Management)

शाबर मंत्रों में ‘ध्वनि विज्ञान’ और ‘प्राण ऊर्जा’ का अद्भुत संयोजन होता है। जब कोई साधक हनुमान शाबर मंत्रों का जाप करता है, तो उसके शरीर में अत्यधिक मात्रा में उष्मा (Heat/Tejas) उत्पन्न होती है। हनुमान जी स्वयं अग्नि और वायु तत्व के प्रधान हैं, इसलिए उनकी साधना से मूलाधार और मणिपूर चक्र में तीव्र स्पंदन होता है। यदि इस ऊर्जा का सही प्रबंधन न किया जाए, तो साधक को क्रोध, अनिद्रा, शारीरिक जलन या मानसिक अस्थिरता का सामना करना पड़ सकता है।

ऊर्जा प्रबंधन के लिए निम्नलिखित नियमों का पालन अनिवार्य है:

1. सात्विक आहार और जठराग्नि

साधना काल में भोजन सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। तामसिक भोजन (लहसुन, प्याज, मांस, मदिरा) शरीर में रजस और तमस बढ़ाते हैं, जो मंत्र से उत्पन्न ऊर्जा के साथ मिलकर विस्फोटक स्थिति पैदा कर सकते हैं।

  • अल्पाहार: पेट भरकर भोजन करने से आलस्य (तन्द्रा) आता है। साधक को अपनी भूख से थोड़ा कम खाना चाहिए ताकि प्राण वायु का संचार सुचारू रूप से हो सके।
  • शीतल पदार्थ: शरीर में बढ़ने वाली गर्मी को संतुलित करने के लिए दूध, घी, और फलों का सेवन बढ़ा देना चाहिए। गाय का घी शरीर के ‘ओज’ को बढ़ाता है और मंत्र की गर्मी को सहन करने की शक्ति देता है।

2. ब्रह्मचर्य: ओजस का संरक्षण

हनुमान साधना बिना ब्रह्मचर्य के असंभव है। यहाँ ब्रह्मचर्य का अर्थ केवल शारीरिक संयम नहीं, बल्कि मानसिक संयम भी है। मंत्र जाप से उत्पन्न ऊर्जा (Weerya) अगर काम वासना में व्यय हो जाए, तो सिद्धि नहीं मिलती। जब यह ऊर्जा संरक्षित होती है, तो यह ‘ओजस’ में परिवर्तित होकर मस्तिष्क की ओर (ऊर्ध्वगामी) प्रवाहित होती है, जिससे साधक के चेहरे पर तेज आता है और वाणी सिद्ध होती है।

3. मौन और वाक् सिद्धि

ऊर्जा का सबसे बड़ा अपव्यय ‘बोलने’ में होता है। साधना काल में व्यर्थ की बातचीत, हंसी-मजाक या निंदा से बचना चाहिए। हो सके तो प्रतिदिन कुछ घंटों का ‘मौन’ व्रत रखें। इससे मंत्र की शक्ति शरीर में ही संचित रहती है और ‘वाक् सिद्धि’ (बोला हुआ सत्य होना) की प्राप्ति होती है।

वट वृक्ष के नीचे रुद्राक्ष माला के साथ मंत्र जप करते हुए एक निष्ठावान साधक।


वट वृक्ष के नीचे रुद्राक्ष माला के साथ मंत्र जप करते हुए एक निष्ठावान साधक।

आसन सिद्धि के सूक्ष्म नियम और महत्त्व

साधना में सफलता का आधार ‘आसन’ है। योग सूत्र में कहा गया है—“स्थिरसुखमासनम्”। जब तक शरीर स्थिर नहीं होगा, मन स्थिर नहीं हो सकता। हनुमान शाबर मंत्रों की साधना में आसन सिद्धि के कुछ विशिष्ट और सूक्ष्म नियम हैं, जिन्हें अक्सर साधक नजरअंदाज कर देते हैं।

1. आसन का चुनाव और कुचालक (Insulation) का सिद्धांत

मंत्र जाप के दौरान शरीर में जो विद्युत-चुंबकीय ऊर्जा (Bio-electricity) उत्पन्न होती है, उसे पृथ्वी में जाने से रोकना अत्यंत आवश्यक है (Earthing)। इसलिए आसन का पदार्थ बहुत मायने रखता है।

  • लाल ऊनी आसन: हनुमान साधना के लिए लाल रंग का ऊनी आसन सर्वश्रेष्ठ माना गया है। ऊन विद्युत का कुचालक है और ऊर्जा को सुरक्षित रखता है।
  • कुशा का आसन: कुशा एक विशेष प्रकार की घास है जो ऊर्जा संरक्षण के लिए उत्तम है, लेकिन हनुमान जी के उग्र मंत्रों के लिए ऊनी आसन या मृगचर्म (कृत्रिम या प्रतीकात्मक) का विधान अधिक है।
  • वर्जित आसन: कभी भी नंगी जमीन, पत्थर, लकड़ी या बांस की चटाई पर बैठकर सीधे जाप न करें। इससे आपकी सारी ऊर्जा पृथ्वी में समा जाएगी और साधना निष्फल हो जाएगी।

2. दिशा और मेरुदंड की स्थिति

हनुमान साधना में दिशा का विशेष महत्त्व है। सामान्यतः पूर्व या उत्तर दिशा शुभ मानी जाती है, लेकिन विशेष कामनाओं के लिए (जैसे शत्रु दमन) दक्षिण दिशा का भी प्रयोग होता है, परन्तु यह गुरु निर्देश के बिना नहीं करना चाहिए।

बैठते समय मेरुदंड (Reed ki haddi) बिल्कुल सीधा होना चाहिए। यदि आप झुककर बैठते हैं, तो सुषुम्ना नाड़ी में प्राण का प्रवाह अवरुद्ध होता है, जिससे साधक को नींद आने लगती है या ध्यान भटकता है।

“आसन बाँधों, पासन बाँधों, बाँधों अपनी काया।
धरती माता बोझ सम्भालो, जब तक जपूँ मैं माया।।”

(साधना से पूर्व आसन को अभिमंत्रित करने का भाव)

3. आसन त्यागने की विधि (इंद्र गायत्री प्रयोग)

यह सबसे महत्त्वपूर्ण और गुप्त नियम है। जाप पूर्ण होने के बाद तुरंत आसन से नहीं उठना चाहिए।

  • जाप समाप्त होने के बाद, अपने आसन के नीचे की भूमि पर एक चम्मच जल गिराएं।
  • उस गीली मिट्टी या जल को अनामिका अंगुली से स्पर्श करके अपने माथे पर तिलक लगाएं।
  • परंपरागत मान्यता है कि यदि आप ऐसा नहीं करते, तो आपके जाप का सारा फल देवराज इंद्र ले जाते हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, यह प्रक्रिया शरीर के उच्च वोल्टेज को सामान्य (Grounding) करने और ऊर्जा को ‘लॉक’ करने की क्रिया है।
  • इसके बाद ही हनुमान जी को प्रणाम करके आसन को मोड़कर सुरक्षित स्थान पर रखना चाहिए।

हनुमान शाबर मंत्रों की साधना एक विज्ञान है। जब षटकर्म का सात्विक प्रयोग, प्राण ऊर्जा का सही प्रबंधन, और आसन के सूक्ष्म नियमों का पालन एक साथ किया जाता है, तो साधक न केवल अपनी मनोकामनाएं पूर्ण करता है, बल्कि वह हनुमान जी के अनुग्रह का पात्र भी बन जाता है। अगले खंड में हम चर्चा करेंगे कि यदि साधना में त्रुटि हो जाए तो उसका प्रायश्चित कैसे करें और हनुमान जी के प्रत्यक्ष दर्शन के अनुभव कैसे होते हैं।






Hanuman Shabar Mantra Blog Part 2

तांत्रिक विकृतियों से बचाव और हनुमान शाबर मंत्रों का रक्षात्मक कवच

साधना का मार्ग तलवार की धार पर चलने जैसा होता है। जब एक साधक हनुमान शाबर मंत्रों की उच्च ऊर्जा के साथ प्रयोग करता है, तो वह न केवल सकारात्मक शक्तियों को आकर्षित करता है, बल्कि ब्रह्मांड में विचरने वाली नकारात्मक और तामसिक शक्तियां भी उसकी ओर आकर्षित हो सकती हैं। इसे ही साधना जगत में ‘तांत्रिक विकृति’ या ‘साधना में विघ्न’ कहा जाता है। इन विकृतियों से बचाव ही एक साधक की प्राथमिकता होनी चाहिए।

हनुमान जी को ‘संकटमोचन’ और ‘भूत-पिशाच निकट नहीं आवे’ का वरदान प्राप्त है, इसलिए उनके शाबर मंत्र स्वयं में एक वज्र कवच का कार्य करते हैं। तथापि, यदि साधक बिना सुरक्षा घेरे के उच्च कोटि की साधना करता है, तो उसे मानसिक अस्थिरता, भयानक स्वप्न, या शारीरिक अस्वस्थता का सामना करना पड़ सकता है।

आत्म-रक्षा और सुरक्षा घेरा (Carbandha) का विधान

शाबर परंपरा में साधना आरम्भ करने से पूर्व ‘शरीर बंधन’ या ‘रक्षा घेरा’ बनाना अनिवार्य है। यह एक अदृश्य आध्यात्मिक दीवार होती है जो साधक को बाहरी आक्रमणों से सुरक्षित रखती है। जब आप मंत्र जाप कर रहे होते हैं, तो आपकी आभा (Aura) अत्यंत संवेदनशील हो जाती है। उस समय कोई भी निम्नगामी ऊर्जा आप पर प्रभाव डाल सकती है।

हनुमान शाबर मंत्रों में शरीर बंधन के लिए निम्नलिखित प्रक्रिया और मंत्र अत्यंत प्रभावी माने गए हैं। इसे साधना शुरू करने से ठीक पहले करना चाहिए:

“ओम नमः वज्र का कोठा, जिसमें पिंड हमारा पैठा।
ईश्वर कुंजी, ब्रह्म का ताला, मेरे आठों धाम का यती हनुमंत रखवाला।
जो इस कोठे को तोड़े, तो राम लक्ष्मण का जनेऊ तोड़े।
दुहाई गुरु गोरखनाथ की। मेरी भक्ति, गुरु की शक्ति।
फुरो मंत्र ईश्वरो वाचा॥”

विधि: उपरोक्त मंत्र को पढ़ते हुए अपने चारों ओर जल की एक लकीर खींचें या अपनी तर्जनी उंगली से हवा में एक गोलाकार घेरा बनाएं। यह भावना करें कि हनुमान जी का वज्र तुल्य कवच आपको चारों दिशाओं, ऊपर और नीचे से सुरक्षित कर रहा है।

साधना के दौरान आने वाले मानसिक विक्षेप और उनका समाधान

कई बार साधक को साधना के मध्य में अचानक क्रोध आना, अकारण भय लगना, या शरीर में अत्यधिक गर्मी महसूस होना जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। यह इस बात का संकेत है कि मंत्र की ऊर्जा को आपका शरीर पूरी तरह से ग्रहण नहीं कर पा रहा है या कोई बाहरी बाधा व्यवधान डाल रही है।

  • शीतलीकरण: यदि शरीर में अत्यधिक ताप (Heat) महसूस हो, तो साधना के बाद थोड़ा ठंडा दूध पिएं और हनुमान जी को सौंफ-मिश्री का भोग लगाएं।
  • मानसिक भटकाव: यदि मन विचलित हो, तो शाबर मंत्रों के साथ ‘राम नाम’ का संपुट लगाकर जाप करें। राम नाम अग्नि को शांत करता है और हनुमान जी को तत्काल प्रसन्न करता है।
  • स्वप्न दोष: यदि डरावने सपने आएं, तो सोने से पहले हनुमान चालीसा का पाठ करके और सिरहाने एक लोहे की वस्तु (जैसे चाकू या कील) रखकर सोएं।

शाबर साधना में ‘आन’ एवं ‘शाप’ का महत्व: एक रहस्यमय विज्ञान

वैदिक मंत्रों और शाबर मंत्रों में जो सबसे मूलभूत अंतर है, वह है ‘आन’ (शपथ) और ‘शाप’ (बाध्यता) का प्रयोग। सामान्य बुद्धि से देखने पर यह विचित्र और अनुचित लग सकता है कि एक भक्त अपने इष्ट देव को शपथ दे रहा है या उन्हें कार्य न करने पर किसी प्रिय की दुहाई दे रहा है। परन्तु, शाबर विज्ञान में यह ‘भक्ति की हठ’ और ‘अधिकार’ का प्रतीक है।

साधना के दौरान सुरक्षा चक्र और ऊर्जा प्रवाह का प्रतीकात्मक चित्रण।


साधना के दौरान सुरक्षा चक्र और ऊर्जा प्रवाह का प्रतीकात्मक चित्रण।

‘आन’ (शपथ) का आध्यात्मिक अर्थ

‘आन’ शब्द का अर्थ है – मर्यादा या शपथ। शाबर मंत्रों की रचना गुरु गोरखनाथ और नवनाथों द्वारा उस कालखंड में की गई थी जब संस्कृत का ज्ञान आम जनमानस से लुप्त हो रहा था। इन सिद्धों ने स्थानीय और ग्रामीण भाषा में ऐसे मंत्र रचे जो सीधे हृदय से निकलते थे।

हनुमान शाबर मंत्रों में अक्सर आप पाएंगे: “दुहाई श्री राम की”, “आन माता अंजनी की”, या “सीता मैया के पिय की”

यह देवता का अपमान नहीं है, बल्कि यह उस प्रेम संबंध का दोहन है जो देवता का अपने इष्ट के प्रति है। उदाहरण के लिए, हनुमान जी स्वयं के प्राण त्याग सकते हैं लेकिन श्री राम की बात नहीं टाल सकते। जब साधक कहता है – “तुम्हें राम की सौगंध”, तो वह हनुमान जी की उस भक्ति को जागृत करता है जो उन्हें राम के प्रति है। यह मंत्र को एक ‘आदेश’ में बदल देता है, जिसे टालना देवता के लिए अपने इष्ट की मर्यादा तोड़ने समान हो जाता है।

‘शाप’ या ‘दुहाई’ की मनोवैज्ञानिक और यौगिक प्रक्रिया

शाबर मंत्रों में ‘शाप’ का प्रयोग एक अत्यंत उच्च कोटि की तांत्रिक प्रक्रिया है जिसे ‘कीलन’ कहा जाता है। यह ऊर्जा को एक दिशा में प्रवाहित करने (Channelize) का कार्य करता है।

  • एकाग्रता का शिखर: जब साधक ‘दुहाई’ देता है, तो उसका आत्मविश्वास चरम पर होता है। उसे विश्वास होता है कि अब देवता को आना ही पड़ेगा। यह दृढ़ विश्वास ही मंत्र को सिद्ध करता है।
  • नाथ परंपरा का हठ योग: नाथ संप्रदाय ‘हठ’ पर आधारित है। जैसे एक ज़िद्दी बालक अपनी माँ से हठ करके अपनी बात मनवा लेता है, वैसे ही शाबर मंत्र का साधक ‘शाप’ और ‘आन’ के माध्यम से हठ पूर्वक शक्ति को कार्य करने के लिए विवश करता है।
  • देवता और भक्त के बीच का अनौपचारिक संबंध: वैदिक मंत्रों में देवता और भक्त के बीच एक दूरी और औपचारिकता होती है। शाबर मंत्रों में भक्त देवता को अपना सखा या परिवार का सदस्य मानता है, जिससे उसे उलाहना देने या कसम देने का अधिकार मिल जाता है।

प्रमुख ‘आन’ जो हनुमान शाबर मंत्रों में प्रयुक्त होती हैं

साधक को इन शब्दों का उच्चारण करते समय पूर्ण श्रद्धा और गंभीरता रखनी चाहिए। इसे खेल नहीं समझना चाहिए:

  1. राम की आन: यह सबसे शक्तिशाली बंधन है। हनुमान जी इसके आगे विवश हो जाते हैं।
  2. माता अंजनी का दूध: “जो न करे तो माता अंजनी का दूध हराम” – यह वाक्य अत्यंत उग्र है और इसका प्रयोग केवल विपत्ति काल में ही किया जाता है।
  3. सुलेमान पैगंबर या पीर: कई शाबर मंत्रों में इस्लामिक पीरों की दुहाई भी दी जाती है, जो यह दर्शाता है कि शाबर विद्या धर्मों से परे एक सार्वभौमिक ऊर्जा विज्ञान है।
  4. गुरु गोरखनाथ की दुहाई: चूंकि इन मंत्रों के रचयिता गुरु गोरखनाथ हैं, इसलिए उनकी दुहाई से मंत्र की सुप्त शक्ति जागृत होती है।

“शब्द सांचा, पिंड कांचा, फुरो मंत्र ईश्वरो वाचा।”

यह पंक्ति लगभग हर शाबर मंत्र के अंत में आती है। इसका अर्थ है – “मेरा शरीर नश्वर (कच्चा) हो सकता है, लेकिन यह शब्द (मंत्र) सत्य है और यह ईश्वर की वाणी की तरह फलित हो।” यह साधक के संकल्प को ब्रह्मांडीय सत्य से जोड़ता है।

निष्कर्ष

हनुमान शाबर मंत्र साधना, भारतीय आध्यात्म की वह गुप्त कुंजी है जो साधारण मनुष्य को असाधारण शक्तियों का स्वामी बना सकती है। यह मार्ग जितना सरल दिखता है, उतना ही यह अनुशासन और पवित्रता की मांग करता है। इस विस्तृत विश्लेषण में हमने देखा कि शाबर मंत्र केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि ध्वनि विज्ञान और संकल्प शक्ति का अद्भुत मिश्रण हैं।

जहाँ एक ओर ये मंत्र जीवन की जटिल समस्याओं—चाहे वह आर्थिक संकट हो, शत्रु बाधा हो, या स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं—का त्वरित समाधान प्रदान करते हैं, वहीं दूसरी ओर ये साधक को निर्भीकता और आत्मबल से भर देते हैं। ‘आन’ और ‘शाप’ जैसे तत्व हमें यह सिखाते हैं कि परमात्मा के साथ हमारा संबंध केवल भय या आदर का नहीं, बल्कि प्रेम और अधिकार का भी हो सकता है।

किन्तु, शक्ति के साथ जिम्मेदारी भी आती है। इन मंत्रों का प्रयोग कभी भी किसी के अहित, वशीकरण द्वारा शोषण, या अहंकार की तुष्टि के लिए नहीं किया जाना चाहिए। हनुमान जी सात्विकता और धर्म के रक्षक हैं; अधार्मिक कृत्यों में इन मंत्रों का प्रयोग उल्टा प्रभाव (Backfire) डाल सकता है। तांत्रिक विकृतियों से बचाव के लिए बताए गए सुरक्षा घेरों और नियमों का पालन करना अनिवार्य है।

अंततः, सफलता की कुंजी ‘गुरु का मार्गदर्शन’ और ‘हनुमान जी के चरणों में अटूट विश्वास’ है। यदि आप सत्य मार्ग पर हैं और आपका उद्देश्य जन-कल्याण या आत्म-रक्षा है, तो हनुमान शाबर मंत्र आपके लिए कल्पवृक्ष सिद्ध होंगे। साधना करें, संयम रखें और उस परम शक्ति के प्रवाह को अपने जीवन में अनुभव करें।

॥ इति शुभम् ॥


Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *