
हनुमान चालीसा का गूढ़ तांत्रिक एवं यौगिक विवेचन: मन्त्र शक्ति एवं चक्र जागरण का विज्ञान
भारतीय अध्यात्म आकाश में गोस्वामी तुलसीदास कृत ‘हनुमान चालीसा’ केवल एक भक्ति काव्य नहीं, अपितु मन्त्र-विज्ञान (Mantra Science) और नाद-योग (Naad Yoga) का एक अद्वितीय ग्रन्थ है। जनमानस में इसे संकट-मोचन के सरल उपाय के रूप में देखा जाता है, किन्तु एक साधक और तत्त्ववेत्ता की दृष्टि से इसका अवलोकन करने पर यह स्पष्ट होता है कि इसकी प्रत्येक अर्धाली, प्रत्येक शब्द और यहाँ तक कि छंद की लयात्मकता में एक गूढ़ तांत्रिक प्रक्रिया सन्निहित है। यह लेख हनुमान चालीसा को केवल धार्मिक पाठ की परिधि से बाहर निकालकर, उसे तन्त्र, योग और मन्त्र-शक्ति के वैज्ञानिक धरातल पर विश्लेषित करने का एक विनम्र प्रयास है। यहाँ हम हनुमान जी को मात्र एक पौराणिक देवता के रूप में नहीं, अपितु ‘महाप्राण’ (Cosmic Prana) और ‘कुण्डलिनी शक्ति’ के प्रेरक बल के रूप में देखेंगे।
बीज मंत्र और ध्वन्यात्मक विज्ञान: स्नायु तंत्र पर स्पंदन का प्रभाव
तन्त्र शास्त्र का आधारभूत सिद्धांत है— ‘यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे’ (जो शरीर में है, वही ब्रह्माण्ड में है) और ध्वनि ही वह माध्यम है जो पिण्ड (शरीर) को ब्रह्माण्ड (चेतना) से जोड़ती है। हनुमान चालीसा की रचना अवधी भाषा में अवश्य है, किन्तु इसकी ध्वन्यात्मक संरचना (Phonetic Structure) संस्कृत के बीज मंत्रों के विज्ञान पर आधारित है।
शब्द-ब्रह्म और नाड़ी शोधन
आधुनिक तंत्रिका विज्ञान (Neuroscience) यह स्वीकार करता है कि विशिष्ट ध्वनियाँ मस्तिष्क के विशिष्ट केंद्रों को उत्तेजित करती हैं। हनुमान चालीसा का पाठ करते समय जो ध्वनि तरंगें उत्पन्न होती हैं, वे साधक के सूक्ष्म शरीर (Subtle Body) की बहत्तर हजार नाड़ियों में एक विशिष्ट कम्पन पैदा करती हैं।
उदाहरणार्थ, चालीसा का प्रारम्भ “श्री गुरु चरण सरोज रज…” से होता है। यहाँ ‘श्री’ शब्द स्वयं में एक पूर्ण लक्ष्मी बीज है, जो मस्तिष्क के ‘सेरेब्रल कॉर्टेक्स’ (Cerebral Cortex) में शीतलता और एकाग्रता का संचार करता है। ‘गुरु’ शब्द में ‘गु’ (अंधकार) और ‘रु’ (प्रकाश) का जो संयोग है, वह जिह्वा के अग्रभाग से उच्चारित होकर सीधे आज्ञा चक्र (Pineal Gland) को झंकृत करता है। यह केवल वंदना नहीं है; यह साधक की इड़ा और पिंगला नाड़ियों को संतुलित कर सुषुम्ना के द्वार खोलने की ‘कीलक’ प्रक्रिया है।
कवच और कीलक का विज्ञान
तांत्रिक दृष्टि से, हनुमान चालीसा में अनेक गुप्त बीज मंत्र पिरोये गए हैं।
- हं (Ham): हनुमान जी का नाम स्वयं ‘हं’ बीज से प्रारम्भ होता है, जो विशुद्ध चक्र (Throat Chakra) का बीज मंत्र है। यह आकाश तत्व का प्रतिनिधित्व करता है। जब हम “जय हनुमान ज्ञान गुन सागर” का उच्चारण करते हैं, तो कंठ कूप में जो घर्षण होता है, वह थायरॉयड ग्रंथि को संतुलित करता है और वाक-सिद्धि प्रदान करता है।
- रं (Ram): पूरी चालीसा में राम नाम की पुनरावृत्ति ‘रं’ बीज (अग्नि तत्व) का जागरण करती है। यह मणिपूर चक्र को सक्रिय करता है, जिससे साधक के भीतर का आलस्य और तमस जलकर भस्म हो जाता है। “राम दूत अतुलित बल धामा” में ‘र’ कार की आवृत्ति सौर जाल (Solar Plexus) में प्राण ऊर्जा का विस्फोट करती है।
- वायु तत्त्व और स्पर्श विज्ञान: हनुमान जी वायु पुत्र हैं। वायु का गुण है ‘स्पर्श’ और इसका संबंध त्वचा और तंत्रिका तंत्र (Nervous System) से है। चालीसा का लयात्मक पाठ पैरासिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम (Parasympathetic Nervous System) को सक्रिय करता है, जिससे तनाव (Stress) और चिंता (Anxiety) का शमन होता है। यह एक प्रकार का ‘ध्वनि-चिकित्सा’ (Sound Therapy) सत्र है जो विक्षिप्त प्राणों को सुव्यवस्थित करता है।
षट्चक्र भेदन और मारुति शक्ति: मूलाधार से सहस्रार की यात्रा
योग शास्त्र में हनुमान जी को ‘प्राण’ का स्वरूप माना गया है और मन को ‘पवन’ का। ‘चले वाते चलं चित्तं निश्चले निश्चलं भवेत्’ (हठयोग प्रदीपिका) – जब प्राण चलता है तो चित्त चलता है, जब प्राण स्थिर होता है तो चित्त स्थिर होता है। हनुमान चालीसा का पाठ वास्तव में कुण्डलिनी शक्ति को मूलाधार से उठाकर सहस्रार तक ले जाने की एक क्रमिक यौगिक यात्रा है। आइए, इस यात्रा के सोपानों को चालीसा की चौपाइयों के माध्यम से समझें।
1. मूलाधार चक्र और पृथ्वी तत्त्व: स्थिरता की स्थापना
“जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर।।”
मूलाधार चक्र मानव अस्तित्व की नींव है। यहाँ ‘कपीस’ शब्द का प्रयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है। वानर चंचल मन का प्रतीक है, लेकिन ‘ईश’ जुड़ने से वह नियंत्रित मन हो जाता है। जब साधक हनुमान जी का आवाहन करता है, तो वह अपने अस्तित्व (मूलाधार) में स्थिरता मांग रहा होता है। लाल रंग के लंगोट और सिन्दूर धारण किये हुए हनुमान जी का ध्यान मूलाधार की सुप्त ऊर्जा को जाग्रत करता है। यह पृथ्वी तत्व को शुद्ध कर साधक को भयमुक्त करता है, क्योंकि मूलाधार का मुख्य विकार ‘भय’ है, और हनुमान ‘निर्भय’ हैं।
2. स्वाधिष्ठान चक्र और जल तत्त्व: वासना का नियंत्रण
“शंकर सुवन केसरी नंदन। तेज प्रताप महा जग वंदन।।”
स्वाधिष्ठान चक्र सृजन और काम ऊर्जा का केंद्र है। यहाँ हनुमान जी को ‘शंकर सुवन’ (रुद्र का अंश) कहा गया है। रुद्र संहारक हैं—वे काम का दहन करने वाले हैं। हनुमान जी पूर्ण ब्रह्मचारी हैं। उनका ध्यान साधक को ऊर्ध्वरेता (Sublimation of sexual energy) बनाता है। चालीसा का यह अंश साधक की रचनात्मक ऊर्जा को निम्नगामी होने से रोकता है और उसे ओजस (Ojas) में परिवर्तित करता है। ‘तेज प्रताप’ शब्द शरीर में आभा-मंडल (Aura) का विस्तार करता है।
3. मणिपूर चक्र और अग्नि तत्त्व: संकल्प और पुरुषार्थ
“लाय सजीवन लखन जियाये। श्री रघुबीर हरषि उर लाये।।”
“प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं।।”
मणिपूर चक्र नाभि में स्थित है और यह इच्छा शक्ति (Will Power) का केंद्र है। समुद्र लांघना कोई सामान्य घटना नहीं, अपितु मणिपूर चक्र की अग्नि द्वारा ‘भवसागर’ को लांघने का रूपक है। जब हनुमान जी मुद्रिका मुख में रखते हैं, तो यह मौन और अंतर्मुखी साधना का प्रतीक है। लंका दहन इसी चक्र की क्रियाशीलता है—जठराग्नि और योगाग्नि का प्रज्वलित होना, जो शरीर के विकारों (राक्षसों) को जलाकर भस्म कर देती है। यह वह अवस्था है जहाँ साधक को ‘अष्ट सिद्धि और नवनिधि’ की प्राप्ति होती है, जो मणिपूर के पूर्ण जागरण का लक्षण है।
4. अनाहत चक्र और वायु तत्त्व: भक्ति और समर्पण
“राम द्वारे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे।।”
“और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेइ सर्ब सुख करई।।”
अनाहत चक्र हृदय में स्थित है, जहाँ जीवात्मा का वास है। हनुमान जी कहते हैं कि मेरे हृदय में राम-सीता बसते हैं। तांत्रिक साधना में, अनाहत चक्र ‘भक्ति’ का स्थान है। यहाँ द्वैत भाव समाप्त होने लगता है। “राम द्वारे” का अर्थ है कि ईश्वर (राम) तक पहुँचने के लिए प्राण (हनुमान) का संयम आवश्यक है। बिना प्राणायाम और प्राण-निग्रह के हृदय की ग्रंथि (विष्णु ग्रंथि) नहीं खुलती। यहाँ साधक वायु तत्व में लीन होकर प्रेम के विस्तार का अनुभव करता है। हनुमान जी यहाँ ‘दास’ भाव में नहीं, अपितु उस द्वारपाल के रूप में हैं जो अहंकार को भीतर नहीं जाने देते।
5. विशुद्ध चक्र और आकाश तत्त्व: ज्ञान और वाक शक्ति
“विद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर।।”
कंठ में स्थित विशुद्ध चक्र सरस्वती का स्थान है। ‘विद्यावान’ और ‘गुनी’ होना इसी चक्र के जागरण का परिणाम है। यहाँ हनुमान जी केवल बल के प्रतीक नहीं, अपितु ‘ज्ञान नाम अग्रगण्यम्’ (ज्ञानियों में अग्रगण्य) हैं। विशुद्ध चक्र जब जाग्रत होता है, तो साधक की वाणी सत्य और सिद्ध हो जाती है। “को नहीं जानत है जग में कपि, संकट मोचन नाम तिहारो”—यह उद्घोष आकाश तत्व की व्यापकता को दर्शाता है। यहाँ साधक क्षुद्र अहम से ऊपर उठकर विराट चेतना के साथ संवाद करने में सक्षम हो जाता है।
6. आज्ञा चक्र और सहस्रार: पूर्णता और कैवल्य
“साधु संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे।।”
“अंत काल रघुबर पुर जाई। जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई।।”
आज्ञा चक्र (भ्रूमध्य) गुरु का स्थान है और हनुमान जी परम गुरु तत्व हैं। वे “साधु संत” (सत्व गुणी वृत्तियों) की रक्षा करते हैं और “असुर” (तामसिक वृत्तियों) का नाश करते हैं। चालीसा का समापन “पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप” के साथ होता है। यहाँ ‘मंगल मूरति’ का अर्थ है वह स्वरूप जो कल्याणकारी है, जो शिवत्व है। सहस्रार चक्र में पहुँचकर साधक समय (Time/Kaal) से परे हो जाता है—”अंत काल रघुबर पुर जाई”। यह मोक्ष की अवस्था है, जहाँ प्राण (हनुमान) परमात्मा (राम) में विलीन हो जाते हैं। यह योग की ‘उन्मनी’ अवस्था है।
सूक्ष्म शरीर पर दोहा और चौपाई के छंद का प्रभाव
तुलसीदास जी ने चालीसा की संरचना ‘दोहा’ और ‘चौपाई’ छंद में की है। मंत्र शास्त्र के अनुसार, छंद केवल काव्य का नियम नहीं, बल्कि श्वास-प्रश्वास (Breathing Pattern) को नियंत्रित करने की तकनीक है।
चौपाई का प्रभाव: चौपाई में चार चरण होते हैं और यह द्रुत गति से पढ़ी जाती है। इसका सीधा प्रभाव ‘पिंगला नाड़ी’ (Solar Channel) पर पड़ता है। यह शरीर में ताप और ऊर्जा बढ़ाती है। जब कोई व्यक्ति अवसाद (Depression) या सुस्ती में हो, तो चौपाई की लय उसके रक्त संचार को बढ़ाकर उसे कर्मठ बनाती है।
दोहा का प्रभाव: दोहा अर्द्ध-सम मात्रिक छंद है, जो विश्राम और चिंतन का सूचक है। यह ‘इड़ा नाड़ी’ (Lunar Channel) को पुष्ट करता है। चालीसा के प्रारम्भ और अंत में दोहा होने का अर्थ है कि ऊर्जा के विस्फोट (चौपाई) से पहले और बाद में मानसिक शांति और संतुलन आवश्यक है। यह लयबद्ध श्वास क्रिया (Rhythmic Breathing) को स्वतः ही प्रेरित करती है, जो प्राणायाम का ही एक सरल रूप है।
निष्कर्ष: भक्ति और तंत्र का अद्वैत
इस प्रकार, यदि हम तात्विक दृष्टि से देखें, तो हनुमान चालीसा का पाठ केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक पूर्ण ‘साधना पद्धति’ है। इसमें शब्द-ब्रह्म की शक्ति है जो सुषुप्त स्नायु तंत्र को झंकृत करती है, और इसमें चक्र-भेदन का विज्ञान है जो पशुता से देवत्व की यात्रा कराता है।
साधक जब “श्री गुरु चरण…” का उच्चारण करता है, तो वह अपने अस्तित्व को गुरु तत्व को समर्पित करता है, और जब वह “हृदय बसहु सुर भूप” कहता है, तो वह अपनी चेतना को परमात्मा में विसर्जित कर देता है। हनुमान जी इस पूरी प्रक्रिया में ‘उत्प्रेरक’ (Catalyst) हैं। वे वह शक्ति हैं जो असंभव को संभव बनाती है—चाहे वह समुद्र लांघना हो या जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होना। अतः, हनुमान चालीसा का पाठ करते समय साधक को केवल शब्दों का रटन नहीं, अपितु उन शब्दों में निहित स्पंदन और प्राण-प्रवाह का अनुभव करना चाहिए। यही इस महामंत्र की सार्थकता है और यही इसका गूढ़ तांत्रिक रहस्य है।
अष्ट सिद्धि और नवनिधि का तांत्रिक रहस्य: परा-मनोवैज्ञानिक शक्तियों (Siddhis) का अर्जन और उनके पीछे का प्राचीन विज्ञान
हनुमान चालीसा की चौपाई “अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता, अस बर दीन जानकी माता” को सामान्यतः एक भक्तिपूर्ण वरदान के रूप में देखा जाता है। परंतु, जब हम इसे तांत्रिक और यौगिक दृष्टि से विश्लेषित करते हैं, तो यह पंक्ति मात्र एक पौराणिक संदर्भ नहीं रह जाती, बल्कि यह मानव चेतना की उच्चतम संभावनाओं (Human Potentiality) और परा-मनोवैज्ञानिक शक्तियों (Parapsychological Powers) के विज्ञान को उद्घाटित करती है। तंत्र शास्त्र में हनुमान जी को ‘सिद्धाचार्य’ माना गया है, अर्थात वह जो न केवल स्वयं सिद्ध हैं, बल्कि अपने साधक की सुप्त चेतना को जागृत कर उसे प्रकृति के नियमों के परे जाने की क्षमता प्रदान करते हैं।
यहाँ ‘सिद्धि’ का अर्थ है—प्रकृति के सूक्ष्म नियमों पर पूर्ण अधिकार। आधुनिक विज्ञान जिसे ‘क्वांटम एंटैंगलमेंट’ (Quantum Entanglement) या ‘सापेक्षता का सिद्धांत’ कहता है, भारतीय योगियों ने हजारों वर्ष पूर्व उसे ‘सिद्धि’ के रूप में अनुभव किया था। आइए, इन अष्ट सिद्धियों का वैज्ञानिक और तांत्रिक विश्लेषण करें।
अष्ट सिद्धियाँ: पदार्थ और ऊर्जा के रूपांतरण का विज्ञान
पतंजलि के योगसूत्र के ‘विभूति पाद’ में इन सिद्धियों का वर्णन मिलता है, जो ‘संयम’ (धारणा, ध्यान और समाधि की एक ही विषय पर एकाग्रता) का परिणाम हैं। हनुमान साधना में ये सिद्धियाँ मूलाधार से लेकर सहस्रार चक्र तक की यात्रा में स्वतः प्रकट होने वाली विभूतियाँ हैं।

- अणिमा (Anima): यह सिद्धि साधक को अणु (Atom) के स्तर तक सूक्ष्म होने की क्षमता प्रदान करती है। तांत्रिक दृष्टि से, यह स्थूल शरीर की सीमाओं को तोड़कर चेतना को सूक्ष्म शरीर (Subtle Body) में संकुचित करने की प्रक्रिया है। आधुनिक भौतिकी के अनुसार, यदि परमाणुओं के बीच के रिक्त स्थान को हटा दिया जाए, तो शरीर एक सूक्ष्म बिंदु के रूप में विद्यमान हो सकता है। हनुमान जी का लंका प्रवेश करते समय “मसक समान रूप कपि धरी” इसी सिद्धि का प्रमाण है।
- महिमा (Mahima): यह अणिमा के ठीक विपरीत है। इसमें साधक अपनी चेतना का विस्तार ब्रह्मांडीय स्तर तक कर सकता है। यह केवल आकार बड़ा करना नहीं है, बल्कि अपनी आभा (Aura) का विस्तार है, जिससे साधक एक ही समय में अनेक स्थानों पर प्रभाव डाल सकता है। “बिकट रूप धरि लंक जरावा” में इसी सिद्धि का प्रयोग हुआ है।
- गरिमा (Garima): यह सिद्धि गुरुत्वाकर्षण के नियमों (Law of Gravity) को चुनौती देती है। इसके द्वारा साधक अपने शरीर के घनत्व (Density) को इतना बढ़ा सकता है कि उसे कोई शक्ति हिला न सके। महाभारत में भीम द्वारा हनुमान जी की पूंछ न उठा पाना, गरिमा सिद्धि का उत्कृष्ट उदाहरण है। वैज्ञानिक रूप से, यह शरीर के कणों के ‘मास’ (Mass) को नियंत्रित करने की क्षमता है।
- लघिमा (Laghima): यह लेविटेशन (Levitation) या भारहीनता की अवस्था है। यौगिक क्रियाओं द्वारा शरीर में वायु तत्त्व और आकाश तत्त्व की प्रधानता बढ़ाकर साधक गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव को शून्य कर सकता है। “पवन तनय” होने के नाते हनुमान जी इस सिद्धि के स्वामी हैं, जो उन्हें वायु में उड़ने की क्षमता प्रदान करती है।
- प्राप्ति (Prapti): यह टेलीपोर्टेशन (Teleportation) या इच्छा मात्र से किसी वस्तु को प्राप्त करने की शक्ति है। क्वांटम फिजिक्स में इसे ‘टनलिंग’ के रूप में समझा जा सकता है, जहाँ कण बाधाओं के पार चले जाते हैं। तांत्रिक साधना में, यह संकल्प शक्ति की वह तीव्रता है जहाँ ‘इच्छा’ और ‘प्राप्ति’ के बीच का समय शून्य हो जाता है।
- प्राकाम्य (Prakamya): यह सिद्धि जल में पृथ्वी की तरह चलने, या ठोस पदार्थों से गुजरने की क्षमता है। यह पदार्थ की अवस्थाओं (States of Matter) को बदलने की शक्ति है। साधक अपनी इच्छाशक्ति से प्राकृतिक तत्वों के व्यवहार को बदल सकता है।
- ईशित्व (Ishitva): यह ‘ईश्वर’ तत्त्व या प्रभुत्व की प्राप्ति है। यह शक्ति है—सृजन और विनाश की। तांत्रिक दृष्टि से, यह पंचमहाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) पर पूर्ण नियंत्रण है। जब साधक का आज्ञा चक्र पूर्णतः जागृत हो जाता है, तब ईशित्व की प्राप्ति होती है।
- वशित्व (Vashitva): यह मन को नियंत्रित करने की शक्ति है—न केवल अपना, बल्कि दूसरों का भी। यह उच्च स्तरीय सम्मोहन (Hypnotism) और टेलीपैथी का मिश्रण है। हनुमान जी द्वारा विभिन्न असुरों की बुद्धि को भ्रमित करना या भक्तों के मन को भक्ति की ओर मोड़ना इसी सिद्धि का परिचायक है।
नवनिधि: मानसिक और भौतिक समृद्धि का मनोविज्ञान
निधियाँ केवल भौतिक खजाना नहीं हैं, बल्कि ये ‘समृद्धि की चेतना’ (Prosperity Consciousness) हैं। तंत्र में कुबेर की नौ निधियाँ (पद्म, महापद्म, शंख, मकर, कच्छप, मुकुंद, कुंद, नील और खर्व) वास्तव में साधक के मनोवैज्ञानिक स्तरों (Psychological States) को दर्शाती हैं। हनुमान जी की उपासना साधक के मन से ‘अभाव’ (Scarcity) की ग्रंथि को नष्ट कर ‘पूर्णता’ (Abundance) का भाव जागृत करती है। जब आंतरिक रसायन (Inner Chemistry) बदलता है, तो बाहरी जगत में भी सफलता और संसाधन चुंबक की भांति आकर्षित होते हैं।
प्राण तत्त्व का नियमन: ‘पवन तनय’ के रूप में श्वास-प्रश्वास की यौगिक क्रिया और प्राणिक हीलिंग का विस्तृत विश्लेषण
हनुमान चालीसा के पाठ और हनुमान जी के स्वरूप के केंद्र में जो सबसे महत्त्वपूर्ण यौगिक विज्ञान छिपा है, वह है—प्राण विज्ञान (Science of Prana)। उन्हें “पवन तनय” (वायु का पुत्र) कहा जाता है। योग शास्त्र में ‘वायु’ या ‘पवन’ केवल वायुमंडलीय हवा नहीं है, बल्कि यह वह प्राणिक ऊर्जा है जो सम्पूर्ण ब्रह्मांड और हमारे शरीर को संचालित करती है। हनुमान जी साक्षात ‘मुख्य प्राण’ के प्रतीक हैं।
‘पवन तनय’ का यौगिक अर्थ: मन और प्राण का संबंध
हठयोग प्रदीपिका में कहा गया है: “चले वाते चलं चित्तं निश्चले निश्चलं भवेत्” (जब प्राण चलता है, तो चित्त भी चलता है; जब प्राण निश्चल होता है, तो चित्त भी निश्चल हो जाता है)।
हनुमान जी मन की चंचलता को जीतकर स्थिर बुद्धि के स्वामी हैं। वानर रूप ‘चंचल मन’ का प्रतीक है, और हनुमान जी उस वानर मन के ‘ईश्वर’ हैं। जब एक साधक हनुमान जी को ‘पवन पुत्र’ के रूप में पूजता है, तो वह वास्तव में अपने श्वास (Breath) को अनुशासित करने की साधना कर रहा होता है। हनुमान चालीसा का लयबद्ध पाठ एक प्रकार का ‘नाद-प्राणायाम’ है। चौपाइयों का उच्चारण करते समय श्वास और उच्छ्वास (Inhalation and Exhalation) का एक विशिष्ट अनुपात बनता है, जो फेफड़ों की क्षमता बढ़ाता है और रक्त में ऑक्सीजन के प्रवाह को संतुलित करता है।

पंच प्राण और हनुमान साधना
हमारे शरीर में वायु पाँच मुख्य रूपों में कार्य करती है, और हनुमान जी की शक्ति इन पांचों का नियमन करती है:
- प्राण वायु: हृदय क्षेत्र में स्थित। हनुमान जी का हृदय में राम को धारण करना अनाहत चक्र की जागृति और प्राण वायु के ऊर्ध्वगमन को दर्शाता है।
- अपान वायु: नाभि के नीचे। ब्रह्मचर्य का पालन और संयम अपान वायु को नियंत्रित कर उसे ऊपर की ओर उठाता है (ओजस में रूपांतरण), जो हनुमान जी के व्यक्तित्व का मूल है।
- समान वायु: पाचन और संतुलन। हनुमान जी की असीमित शक्ति और भूख (सूर्य को निगलना) समान वायु की प्रबलता को दर्शाती है।
- उदान वायु: कंठ क्षेत्र। यह संवाद और अभिव्यक्ति की शक्ति है। हनुमान जी का ‘विद्यावान गुनी अति चातुर’ होना उदान वायु की सिद्धि है।
- व्यान वायु: सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त। शरीर को बड़ा या छोटा करना, या पर्वत उठाना, व्यान वायु के नियंत्रण से ही संभव है।
कुम्भक और महाप्राण की साधना
तांत्रिक ग्रंथों में हनुमान जी को ‘कुम्भक’ का आचार्य माना गया है। कुम्भक का अर्थ है श्वास को रोककर रखना। जब श्वास रुकती है, तो विचार रुक जाते हैं, और जब विचार रुकते हैं, तो समय (Time) का भान समाप्त हो जाता है। यही वह अवस्था है जहाँ साधक ‘कालातीत’ हो जाता है। “जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते, कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते” – यह पंक्ति उस अवस्था की ओर संकेत करती है जो समय और दिशाओं की सीमाओं से परे है, जिसे केवल प्राण के पूर्ण निरोध (समाधि) द्वारा ही जाना जा सकता है।
प्राणिक हीलिंग और ‘नासे रोग हरै सब पीरा’ का विज्ञान
हनुमान चालीसा की पंक्ति “नासे रोग हरै सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत बीरा” में ध्वनि चिकित्सा (Sound Therapy) और प्राणिक हीलिंग का गहरा विज्ञान निहित है।
1. मंत्र-ध्वनि का प्रभाव:
‘ह’, ‘न’, ‘म’ जैसे बीजाक्षरों का उच्चारण शरीर के विशिष्ट तंत्रिका केंद्रों (Nerve Centers) को कम्पित करता है। ‘हं’ (हनुमान बीज मंत्र) का उच्चारण विशुद्धि चक्र और अनाहत चक्र में कंपन पैदा करता है। यह कंपन शरीर की ऊर्जा नाड़ियों (मेरिडियन्स) में आए अवरोधों (Blockages) को तोड़ता है। आधुनिक बायो-एनर्जी विज्ञान (Bio-energy Science) यह मानता है कि रोग शरीर में पहले ऊर्जा के असंतुलन के रूप में आता है, और बाद में भौतिक शरीर में प्रकट होता है। निरंतर जप से उत्पन्न ध्वनि तरंगें (Sound Waves) शरीर के बायो-प्लाज्मिक फील्ड (आभा मंडल) को साफ करती हैं।
2. संकल्प शक्ति और प्राण का संचरण:
जब साधक ध्यानपूर्वक “हनुमत बीरा” का जप करता है, तो वह ब्रह्मांडीय प्राण ऊर्जा (Cosmic Prana) को आकर्षित करता है। तांत्रिक क्रिया में, इसे ‘शक्तिपात’ के सिद्धांत के समान देखा जा सकता है। साधक अपने संकल्प से रोगग्रस्त अंग पर प्राण ऊर्जा को निर्देशित करता है। हनुमान जी का स्मरण करना, अवचेतन मन को उस ‘संजीवनी शक्ति’ से जोड़ना है जो मृतप्राय कोशिकाओं में भी जीवन का संचार कर सकती है (लक्ष्मण मूर्छा प्रसंग इसका पौराणिक रूपक है)।
3. भय और प्रतिरक्षा प्रणाली (Immunity):
“भूत पिशाच निकट नहिं आवै” – यहाँ भूत-पिशाच को केवल नकारात्मक आत्माओं के रूप में नहीं, बल्कि मानसिक विकारों (Psychosomatic disorders) और रोगाणुओं (Pathogens) के रूप में भी देखा जा सकता है। भय (Fear) मनुष्य की प्रतिरक्षा प्रणाली (Immunity) को सबसे ज्यादा कमजोर करता है (कोर्टिसोल हार्मोन का स्राव करके)। हनुमान चालीसा का पाठ मूलाधार चक्र को सबल करता है, जो सुरक्षा और अभय का केंद्र है। जब भय समाप्त होता है, तो शरीर की प्राकृतिक हीलिंग क्षमता (Homeostasis) अपने आप सक्रिय हो जाती है।
निष्कर्ष: एक तांत्रिक प्रक्रिया
अतः, हनुमान चालीसा में वर्णित अष्ट सिद्धि और प्राण नियमन कोई चमत्कार नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित विज्ञान है। यह चेतना को स्थूल (Gross) से सूक्ष्म (Subtle) की ओर ले जाने की एक क्रमिक प्रक्रिया है। ‘पवन तनय’ की आराधना अंततः अपनी ही श्वास के भीतर छिपे प्राण-ईश्वर को पहचानने और असीम ऊर्जा के स्रोत को जागृत करने की यात्रा है। जब साधक इस विज्ञान को समझकर चालीसा का पाठ करता है, तो वह केवल शब्दों को नहीं दोहराता, बल्कि अपने भीतर के सोए हुए ‘हनुमान’—अर्थात अपनी अनंत क्षमता—को झकझोर कर जगाता है।
मन्त्र संपुट और कवच निर्माण: हनुमान चालीसा के नियमित पाठ से निर्मित होने वाले सूक्ष्म ऊर्जा सुरक्षा घेरे का तांत्रिक अन्वेषण
हनुमान चालीसा के तांत्रिक विश्लेषण के इस अंतिम और सबसे गूढ़ चरण में, हम ध्वनि विज्ञान के उस आयाम में प्रवेश कर रहे हैं जहाँ शब्द केवल अर्थ के वाहक नहीं रह जाते, अपितु वे ऊर्जा के ठोस आवरण (Solidified Energy Fields) में परिवर्तित हो जाते हैं। तन्त्र शास्त्र में इसे ‘कवच निर्माण’ की प्रक्रिया कहा जाता है। सामान्यतः भक्त हनुमान चालीसा का पाठ भक्ति भाव से करते हैं, जो कि उचित है, किन्तु जब इसे ‘मन्त्र योग’ की दृष्टि से देखा जाता है, तो यह एक अत्यधिक शक्तिशाली सुरक्षा प्रणाली के रूप में उभरता है।
ध्वनि तरंगों के भौतिकी और आध्यात्मिक विज्ञान (Psycho-acoustics) के अनुसार, जब एक विशिष्ट लय, छन्द और भाव के साथ किसी मंत्र का पुनरावर्तन (Repetition) किया जाता है, तो वह साधक के सूक्ष्म शरीर (Subtle Body) के चारों ओर एक अभेद्य सुरक्षा घेरा निर्मित करता है। हनुमान चालीसा की चौपाइयाँ इसी सिद्धांत पर कार्य करती हैं। आइये, इस प्रक्रिया को मन्त्र संपुट और ऊर्जा कवच के तांत्रिक दृष्टिकोण से विस्तार से समझें।
संपुट का तांत्रिक अर्थ और प्रयोग
तन्त्र में ‘संपुट’ का अर्थ है—दो शक्तियों के बीच किसी वस्तु या मन्त्र को सुरक्षित करना। जैसे एक डिब्बे (संपुट) में रखी वस्तु सुरक्षित रहती है, वैसे ही जब किसी विशिष्ट बीजाक्षर या मन्त्र के साथ चालीसा का पाठ किया जाता है, तो उसकी शक्ति कई गुना बढ़ जाती है और वह एक निर्देशित ऊर्जा का रूप ले लेती है।
हनुमान चालीसा में संपुट लगाने की विधि अत्यंत गोपनीय और शक्तिशाली मानी जाती है। यदि साधक प्रत्येक चौपाई के आरम्भ और अंत में ‘हं’ (हनुमान बीज) या ‘ॐ हं हनुमते नमः’ का उच्चारण करता है, तो यह ‘संपुटित पाठ’ कहलाता है। यह प्रक्रिया चालीसा की सामान्य ध्वनि तरंगों को लेजर किरण (Laser Beam) की भांति तीक्ष्ण और एकमार्गी बना देती है। तांत्रिक दृष्टि से, यह संपुट साधक की प्राण ऊर्जा (Prana Shakti) को बिखरने से रोकता है और उसे ऊर्ध्वगामी बनाकर सुषुम्ना नाड़ी में प्रवाहित करता है।
‘भूत पिशाच निकट नहिं आवै’: नाद से सुरक्षा कवच का निर्माण
चालीसा की चौपाई “भूत पिशाच निकट नहिं आवै, महाबीर जब नाम सुनावै” केवल एक भय- निवारक पंक्ति नहीं है, अपितु यह कवच निर्माण का मूल सूत्र है। यहाँ ‘भूत’ और ‘पिशाच’ केवल बाह्य नकारात्मक शक्तियों के प्रतीक नहीं हैं, वरन् यह हमारे अवचेतन मन (Subconscious Mind) के दमित भय, कुंठा और नकारात्मक विचारों के भी द्योतक हैं।
जब साधक नियमबद्ध होकर, विशेषकर ब्रह्म मुहूर्त में या संध्याकाल में, रीढ़ को सीधा रखकर इसका पाठ करता है, तो उसके शरीर से निकलने वाली ध्वनि तरंगें एक विशिष्ट आवृत्ति (Frequency) उत्पन्न करती हैं। वैज्ञानिक शब्दावली में इसे ‘बायो-मैग्नेटिक फील्ड’ (Bio-magnetic field) का विस्तार कहा जा सकता है। तन्त्र के अनुसार, यह आवृत्ति ‘वायु तत्व’ को सक्रिय करती है। चूँकि हनुमान वायु पुत्र हैं और प्राण वायु के स्वामी हैं, अत: उनके मन्त्रों का उच्चारण साधक के आभामंडल (Aura) में वायु तत्व का एक ऐसा सघन घेरा बना देता है, जिसे निम्न स्तरीय ऊर्जाएं (Low vibration energies) भेदने में असमर्थ होती हैं।
यह सुरक्षा घेरा ठीक वैसा ही कार्य करता है जैसे पृथ्वी का ओजोन और चुम्बकीय आवरण उसे सूर्य की घातक विकिरणों से बचाता है। नियमित पाठ से साधक का आभामंडल इतना ‘तेजोमय’ (Radiant) हो जाता है कि नकारात्मक विचार या बाह्य कुदृष्टि उसके संपर्क में आते ही भस्म हो जाती है। इसे ही तन्त्र में ‘वज्र कवच’ की संज्ञा दी गई है।
‘जो शत बार पाठ कर कोई’: आवृत्ति और ऊर्जा का घनीभवन
तुलसीदास जी ने चालीसा के अंत में एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण फलश्रुति लिखी है—“जो शत बार पाठ कर कोई, छूटहि बंदि महा सुख होई।” यहाँ ‘शत बार’ (सौ बार) का उल्लेख केवल एक संख्या नहीं है, अपितु यह मन्त्र सिद्धि का एक तांत्रिक गणित है।
मन्त्र विज्ञान के अनुसार, जब किसी ध्वनि समूह को 100 बार (या 108 बार) दोहराया जाता है, तो वह साधक के न्यूरो-लिंग्विस्टिक पैटर्न (Neuro-linguistic patterns) को बदल देती है। सौ बार की आवृत्ति चेतन मन की बाधाओं को तोड़कर अवचेतन मन में मन्त्र को स्थापित कर देती है। तांत्रिक शब्दावली में, यह ऊर्जा के ‘घनीभवन’ (Condensation of Energy) की प्रक्रिया है। जैसे बिखरा हुआ प्रकाश साधारण होता है, किन्तु केन्द्रित प्रकाश अग्नि उत्पन्न कर सकता है, वैसे ही ‘शत बार’ पाठ करने से मन्त्र शक्ति इतनी घनी हो जाती है कि वह ‘बंदि’ (बंधन) को—चाहे वह कर्मों का बंधन हो, ग्रह दोष हो, या कारागार का भय हो—काटने में सक्षम हो जाती है। यह पुनरावृत्ति साधक के चारों ओर एक “साइको-कवच” (Psychic Shield) का निर्माण करती है जो निरंतर सक्रिय रहता है।
सूक्ष्म शरीर और चक्रों पर प्रभाव
कवच निर्माण की यह प्रक्रिया चक्रों के जागरण से सीधे जुड़ी हुई है। हनुमान चालीसा का नियमित और लयात्मक पाठ मुख्य रूप से ‘मणिपुर चक्र’ (Solar Plexus) और ‘अनाहत चक्र’ (Heart Chakra) को प्रभावित करता है।
- मणिपुर चक्र: यह अग्नि और इच्छाशक्ति का केंद्र है। चालीसा का वीर रस और ओजस गुण मणिपुर चक्र को उदीप्त करता है, जिससे साधक में निर्भयता और आत्मविश्वास का एक सुरक्षा कवच बनता है।
- अनाहत चक्र: यह भक्ति और समर्पण का केंद्र है। जब साधक ‘राम रसायन’ का पान करता है, तो अनाहत चक्र से प्रेम और करुणा की तरंगे निकलती हैं। तन्त्र कहता है कि प्रेम सबसे शक्तिशाली सुरक्षा कवच है, क्योंकि जहाँ शुद्ध प्रेम है, वहाँ द्वेष या नकारात्मकता ठहर नहीं सकती।
इस प्रकार, हनुमान चालीसा का तांत्रिक पाठ साधक को केवल मानसिक शांति ही नहीं देता, अपितु उसे एक ‘जाग्रत वीर’ में रूपांतरित कर देता है, जिसका अस्तित्व ही नकारात्मकता के लिए वज्र समान हो जाता है।

निष्कर्ष: शब्द ब्रह्म से आत्म-साक्षात्कार तक
हनुमान चालीसा का तांत्रिक और यौगिक विवेचन हमें यह समझने का अवसर देता है कि यह रचना केवल एक धार्मिक कृत्य नहीं, अपितु एक पूर्ण वैज्ञानिक प्रक्रिया है। आरम्भ में ‘गुरु चरण’ की वंदना से लेकर अंत में ‘हृदय बसहु’ की प्रार्थना तक, यह चालीसा एक क्रमिक यात्रा है—मूलाधार की स्थिरता से लेकर सहस्रार की मुक्ति तक।
हमने देखा कि कैसे इसमें कुंडलिनी जागरण के सूत्र छिपे हैं, कैसे यह अष्ट-सिद्धियों का दाता है, और कैसे यह ध्वनि विज्ञान के माध्यम से हमारे जीवन में एक अभेद्य सुरक्षा कवच का निर्माण करता है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने जन-भाषा अवधी में गूढ़ वैदिक और तांत्रिक रहस्यों को पिरोकर समाज को एक ऐसा अमोघ अस्त्र प्रदान किया है, जो कलयुग के कलुष को धोने में पूर्णतः सक्षम है।
साधक को चाहिए कि वह हनुमान चालीसा को केवल होठों से नहीं, अपितु अपने प्राणों से उच्चारित करे। जब शब्द ‘नाद’ बन जाते हैं, और भाव ‘समाधि’ की ओर उन्मुख होते हैं, तभी हनुमान चालीसा का वास्तविक तांत्रिक स्वरूप प्रकट होता है। यह केवल संकट मोचन का उपाय नहीं, अपितु ‘संकट’ के मूल कारण (अज्ञान) को मिटाकर ‘मोक्ष’ प्राप्त करने का एक सिद्ध राजमार्ग है। हनुमान जी की शक्ति, जो वास्तव में हमारी ही सुप्त आत्म-शक्ति का प्रतिबिम्ब है, इस पाठ के माध्यम से जाग्रत होती है और साधक को ‘राम काज’ अर्थात् जीवन के परम उद्देश्य की ओर अग्रसर करती है।
लेखक के बारे में
आचार्य डॉ. ईशान्त शास्त्री
(वैदिक विज्ञान मर्मज्ञ एवं तन्त्र शास्त्र शोधकर्ता)
आचार्य डॉ. ईशान्त शास्त्री विगत दो दशकों से भारतीय प्राच्य विद्याओं, विशेषकर वैदिक वांग्मय, आगम शास्त्र और मन्त्र विज्ञान के गहन अध्ययन और शोध में संलग्न हैं। संस्कृत व्याकरण और दर्शन में अपनी डॉक्टरेट उपाधि के साथ, उन्होंने हिमालयी परंपरा के सिद्ध योगियों के सानिध्य में नाद योग और कुण्डलिनी विज्ञान का व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त किया है। आचार्य जी का उद्देश्य प्राचीन तांत्रिक रहस्यों को आधुनिक वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करना है, ताकि नई पीढ़ी अपनी आध्यात्मिक विरासत को तर्क और श्रद्धा दोनों के साथ अपना सके। उनके लेख देश-विदेश की प्रतिष्ठित आध्यात्मिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित होते रहते हैं।
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॥ इति शुभम् ॥