Adhyatmik Katha

यहाँ “क्वांटम एन्टैंगलमेंट एवं अद्वैत वेदांत: ब्रह्मांडीय अद्वैतवाद का वैज्ञानिक अन्वेषण” विषय पर एक विस्तृत, विचारोत्तेजक और शोधपूर्ण ब्लॉग पोस्ट प्रस्तुत है। इसकी भाषा शैली शुद्ध, संस्कृतनिष्ठ और अकादमिक हिंदी में है। क्वांटम एन्टैंगलमेंट एवं अद्वैत वेदांत

क्वांटम एन्टैंगलमेंट एवं अद्वैत वेदांत: ब्रह्मांडीय अद्वैतवाद का वैज्ञानिक अन्वेषण

मानव सभ्यता के बौद्धिक इतिहास में सत्य की खोज सदैव दो समानांतर धाराओं में प्रवाहित होती रही है—एक बाह्य जगत का वस्तुनिष्ठ विश्लेषण, जिसे हम ‘विज्ञान’ कहते हैं, और दूसरा अंतर्जगत का आत्मनिष्ठ अन्वेषण, जिसे हम ‘अध्यात्म’ या ‘दर्शन’ की संज्ञा देते हैं। शताब्दियों तक, ये दोनों धाराएं एक-दूसरे के विपरीत तटों की भांति प्रतीत होती रहीं, जहाँ भौतिकी पदार्थ की सूक्ष्मतम इकाइयों का विखंडन करती रही, वहीं वेदांत चेतना की अखंडता का उद्घोष करता रहा। किंतु, इक्कीसवीं सदी के इस संधिकाल में, प्रमात्रा भौतिकी (Quantum Physics) के विस्मयकारी निष्कर्ष और अद्वैत वेदांत की प्राचीन प्रज्ञा एक अभूतपूर्व बिंदु पर मिल रहे हैं। यह मिलन ‘पृथकता के भ्रम’ (Illusion of Separation) के निवारण में निहित है। आज हम ब्रह्मांड के सबसे गूढ़ रहस्यों में से एक, ‘क्वांटम एन्टैंगलमेंट’ (Quantum Entanglement) और उपनिषदों के महावाक्य ‘तत्त्वमसि’ के मध्य एक तात्विक सेतु का निर्माण करेंगे, यह समझने के लिए कि क्या विज्ञान अंततः उसी अद्वैत सत्य की पुष्टि कर रहा है जिसे ऋषियों ने सहस्राब्दियों पूर्व समाधि की अवस्था में अनुभव किया था।

क्वांटम अंतर्संबंध का दिव्य स्वरूप
क्वांटम अंतर्संबंध का दिव्य स्वरूप

भाग १: प्रमात्रा यांत्रिकी का रहस्य – क्वांटम एन्टैंगलमेंट और स्थानिकता का अंत

शास्त्रीय भौतिकी (Classical Physics), जो न्यूटन के नियमों पर आधारित थी, का यह दृढ़ मत था कि ब्रह्मांड पृथक-पृथक वस्तुओं का एक विशाल संग्रह है। इस दृष्टिकोण में, एक वस्तु दूसरी वस्तु को केवल तभी प्रभावित कर सकती है जब वे एक-दूसरे के संपर्क में आएं या उनके बीच किसी बल का आदान-प्रदान हो, जिसकी गति प्रकाश की गति से अधिक नहीं हो सकती। इसे ‘स्थानिकता’ (Locality) का सिद्धांत कहा जाता है। अर्थात, जो यहाँ घटित हो रहा है, वह सुदूर आकाशगंगा में घटित हो रही किसी घटना से स्वतंत्र है। परन्तु, बीसवीं शताब्दी के आरंभ में प्रमात्रा यांत्रिकी के आगमन ने इस धारणा को जड़ से हिला दिया। इस वैज्ञानिक क्रांति के केंद्र में एक ऐसी परिघटना थी जिसे अल्बर्ट आइंस्टीन ने स्वयं “दूरस्थ डरावनी क्रिया” (Spooky action at a distance) कहकर अस्वीकार करने का प्रयास किया था—यही परिघटना आज ‘क्वांटम एन्टैंगलमेंट’ के नाम से विख्यात है।

एन्टैंगलमेंट की परिभाषा और ई.पी.आर. विरोधाभास

क्वांटम एन्टैंगलमेंट एक ऐसी अवस्था है जहाँ दो या दो से अधिक कण (जैसे इलेक्ट्रॉन या फोटॉन) इस प्रकार एक-दूसरे से गुंथे (Entangled) होते हैं कि एक कण की क्वांटम अवस्था का वर्णन दूसरे कण की अवस्था के संदर्भ के बिना नहीं किया जा सकता, चाहे उनके बीच की दूरी कितनी भी क्यों न हो। यदि आप एक कण के ‘स्पिन’ (Spin) या ध्रुवीकरण को मापते हैं, तो उसी क्षण, बिना किसी समयांतराल के, दूसरे कण की अवस्था भी निर्धारित हो जाती है, भले ही वह कण ब्रह्मांड के दूसरे छोर पर क्यों न हो। यह घटना स्थान और समय (Space and Time) की पारंपरिक सीमाओं का उल्लंघन करती प्रतीत होती है।

वर्ष १९३५ में, अल्बर्ट आइंस्टीन, बोरिस पोडोल्स्की और नाथन रोजन ने एक शोध पत्र प्रकाशित किया, जो इतिहास में ‘ई.पी.आर. विरोधाभास’ (EPR Paradox) के नाम से जाना जाता है। उनका तर्क था कि यदि क्वांटम यांत्रिकी यह कहती है कि मापन के क्षण तक कणों की कोई निश्चित अवस्था नहीं होती और वे एक-दूसरे को तात्कालिक रूप से प्रभावित करते हैं, तो यह सिद्धांत अपूर्ण है। आइंस्टीन का मानना था कि “ईश्वर पासे नहीं खेलता” और कणों में कुछ ‘छिपे हुए चर’ (Hidden Variables) अवश्य होने चाहिए जो पहले से ही उनके व्यवहार को निर्धारित करते हैं, जिसे हम अभी तक खोज नहीं पाए हैं। वे ‘स्थानीय यथार्थवाद’ (Local Realism) को बचाने का प्रयास कर रहे थे—यह विचार कि वस्तुएं स्वतंत्र रूप से अस्तित्व में हैं और प्रकाश की गति से तेज कोई सूचना यात्रा नहीं कर सकती।

बेल का प्रमेय: द्वैत के ताबूत में अंतिम कील

दशकों तक यह विवाद केवल एक दार्शनिक चर्चा का विषय बना रहा, जब तक कि १९६४ में आयरिश भौतिक विज्ञानी जॉन स्टीवर्ट बेल ने एक गणितीय ढांचा प्रस्तुत नहीं किया, जिसे ‘बेल का प्रमेय’ (Bell’s Theorem) कहा जाता है। बेल ने एक ऐसी असमिका (Inequality) निर्मित की जो प्रयोगात्मक रूप से यह परीक्षण कर सकती थी कि क्या आइंस्टीन के ‘छिपे हुए चर’ वास्तव में अस्तित्व में हैं या क्वांटम यांत्रिकी की ‘नॉन-लोकैलिटी’ (Non-locality) ही परम सत्य है।

बेल के प्रमेय ने एक स्पष्ट विभाजक रेखा खींच दी: यदि प्रयोगों के परिणाम बेल की असमिका का उल्लंघन करते हैं, तो हमें यह स्वीकार करना होगा कि ब्रह्मांड ‘स्थानीय’ (Local) नहीं है। इसका अर्थ है कि पृथकता एक भ्रम है। १९८० के दशक में एलेन एस्पेक्ट और बाद में अनेक वैज्ञानिकों द्वारा किए गए प्रयोगों ने बार-बार और निर्विवाद रूप से यह सिद्ध किया कि क्वांटम कण बेल की असमिका का उल्लंघन करते हैं। इसके निहितार्थ अत्यंत गहरे और दार्शनिक हैं:

  • स्थानिकता का खंडन (Refutation of Locality): ब्रह्मांड के एक भाग में किया गया कार्य दूसरे भाग को तात्कालिक रूप से प्रभावित करता है। वे दो अलग-अलग घटनाएं नहीं, अपितु एक ही अखंड प्रक्रिया के दो पहलू हैं।
  • यथार्थ की प्रकृति (Nature of Reality): कणों का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है जब तक कि उनका मापन न किया जाए। वे एक संभावना के सागर में तरंगित होते हैं।
  • मौलिक एकत्व (Fundamental Wholeness): एन्टैंगलमेंट यह सुझाव देता है कि बिग बैंग के समय जो पदार्थ एक साथ था, वह आज भी क्वांटम स्तर पर एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है। ब्रह्मांड टुकड़ों का ढेर नहीं, बल्कि एक अविभाज्य जालक (Web) है।
“क्वांटम यांत्रिकी हमें यह स्वीकार करने के लिए विवश करती है कि ब्रह्मांड एक विशाल मशीन के पुर्जों का समूह नहीं है, अपितु यह एक अखंड, अविभाज्य और गतिशील पूर्णता है।” — डेविड बोम

भाग २: अद्वैत वेदांत का आधार – ‘तत्त्वमसि’ और चेतना का महासागर

अब हम अपनी दृष्टि को भौतिकी की प्रयोगशालाओं से हटाकर हिमालय की कंदराओं और उपनिषदों के पन्नों की ओर मोड़ते हैं। जहाँ आधुनिक विज्ञान ‘पदार्थ’ (Matter) के माध्यम से एकत्व तक पहुँचने का प्रयास कर रहा है, वहीं भारतीय दर्शन की मुकुटमणि, ‘अद्वैत वेदांत’, ने सहस्राब्दियों पूर्व ‘चेतना’ (Consciousness) के माध्यम से इसी सत्य का साक्षात्कार किया था। आदि शंकराचार्य द्वारा प्रतिपादित अद्वैत वेदांत केवल एक धर्मशास्त्र नहीं है, अपितु यह वास्तविकता की प्रकृति का एक कठोर तार्किक और अनुभवजन्य विश्लेषण है।

ब्रह्मांडीय चेतना का अंतर्दर्शन
ब्रह्मांडीय चेतना का अंतर्दर्शन

ब्रह्म और जगत: मिथ्या और सत्य का विवेक

अद्वैत वेदांत का केंद्रीय उद्घोष है: “ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः” (ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है, जगत मिथ्या है, और जीव ब्रह्म से भिन्न नहीं है)। यहाँ ‘मिथ्या’ का अर्थ यह नहीं है कि जगत का कोई अस्तित्व नहीं है, अपितु इसका अर्थ है कि जगत का अस्तित्व स्वतंत्र नहीं है; यह एक सापेक्षिक वास्तविकता (Relative Reality) है। जिस प्रकार स्वप्न देखने वाले के लिए स्वप्न सत्य प्रतीत होता है, किन्तु जागने पर वह विलीन हो जाता है, उसी प्रकार अज्ञान की अवस्था में हमें यह नाम-रूपात्मक जगत और उसमें व्याप्त द्वैत (Duality) सत्य प्रतीत होता है। वेदांत के अनुसार, स्थान, काल और निमित्त (Space, Time, and Causation) वे चश्मे हैं जिनके माध्यम से हम उस अखंड ‘एक’ को ‘अनेक’ के रूप में देखते हैं। इसे ही ‘माया’ कहा गया है।

‘तत्त्वमसि’: महावाक्य का दार्शनिक विश्लेषण

छान्दोग्य उपनिषद में वर्णित महावाक्य ‘तत्त्वमसि’ (तत् त्वम् असि) अद्वैत वेदांत का सार है। इसका शाब्दिक अर्थ है—”वह तुम हो”। यहाँ ‘तत्’ (वह) उस परम सत्ता, असीम ब्रह्म, या ब्रह्मांडीय चेतना को इंगित करता है जो समस्त सृष्टि का आधार है। ‘त्वम्’ (तुम) उस व्यक्तिगत चेतना या जीव को इंगित करता है जो स्वयं को सीमित, नश्वर और पृथक मानता है। ‘असि’ (हो) इन दोनों के तादात्म्य या एकत्व को स्थापित करता है।

यह महावाक्य केवल एक काव्यात्मक उपमा नहीं है, बल्कि यह अस्तित्व का एक समीकरण है। ऋषि उद्दालक अपने पुत्र श्वेतकेतु को समझाते हैं कि जिस प्रकार विभिन्न नदियों का जल समुद्र में मिलकर अपना नाम और रूप खो देता है और केवल ‘जल’ रह जाता है, उसी प्रकार व्यक्तिगत आत्मा और ब्रह्म में तात्विक रूप से कोई भेद नहीं है। भेद केवल उपाधियों (सीमितताओं) का है। यदि हम घड़े के अंदर के आकाश और घड़े के बाहर के महाकाश को देखें, तो भेद केवल ‘घड़े’ की दीवार का है; आकाश तो सर्वत्र एक ही है। जैसे ही घड़ा फूटता है, घटाकाश और महाकाश का भेद समाप्त हो जाता है।

चेतना की अविभाज्यता (Indivisibility of Consciousness)

क्वांटम एन्टैंगलमेंट जिस प्रकार कणों की ‘पृथकता’ (Separation) को चुनौती देता है, अद्वैत वेदांत उसी प्रकार ‘चेतना’ की बहुलता को नकारता है। हम सामान्यतः मानते हैं कि “मेरी चेतना” और “तुम्हारी चेतना” अलग-अलग हैं क्योंकि हमारे शरीर और मन अलग हैं। वेदांत इसे एक भ्रांति मानता है। चेतना प्रकाश की भाँति है; यह जिन वस्तुओं (शरीर-मन) को प्रकाशित करती है, उनसे प्रभावित नहीं होती और न ही उनके द्वारा विभाजित होती है।

अद्वैत के अनुसार, चेतना ‘स्थानीय’ (Local) नहीं है, यह शरीर के भीतर कैद नहीं है। यह सर्वव्यापी, अखंड और अनंत है। जिसे हम ‘मैं’ कहते हैं, वह वास्तव में उस अनंत दृष्टा (Witness) का प्रतिबिंब मात्र है। इस संदर्भ में, निम्नलिखित बिंदुओं पर विचार करना आवश्यक है:

  • ज्ञातृ-ज्ञान-ज्ञेय का एकीकरण: अद्वैत वेदांत में, परमोच्च अवस्था वह है जहाँ ज्ञाता (Knower), ज्ञान (Knowledge) और ज्ञेय (Known) का भेद मिट जाता है। सब कुछ केवल ‘शुद्ध चैतन्य’ (Pure Consciousness) के रूप में अनुभव किया जाता है।
  • विभुत्व (All-pervasiveness): आत्मा या ब्रह्म अणु (छोटा) भी है और महान (बड़ा) भी। यह देश और काल से अतीत है, ठीक वैसे ही जैसे क्वांटम स्तर पर कणों की अवस्था देश-काल की सीमाओं में नहीं बँधती।
  • पारलौकिक संबंध (Transcendental Connection): हम सभी एक ही चेतना के सूत्र में पिरोए हुए मणियाँ हैं। दूसरों को चोट पहुँचाना, अंततः स्वयं को चोट पहुँचाना है, क्योंकि ‘दूसरा’ कोई है ही नहीं।
“ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्”
— (ईशावास्योपनिषद्)

अर्थात्: इस अखिल ब्रह्मांड में जो कुछ भी जड़-चेतन स्वरूप जगत है, वह सब ईश्वर (चेतना) से व्याप्त है।

भाग ३: विज्ञान और वेदांत का संगम – एक नए प्रतिमान की ओर

जब हम बेल के प्रमेय और ‘तत्त्वमसि’ को एक साथ रखकर देखते हैं, तो एक आश्चर्यजनक चित्र उभरता है। क्वांटम भौतिकी हमें बता रही है कि भौतिक स्तर पर ‘पृथकता’ एक भ्रम है; ब्रह्मांड एक जटिल, परस्पर गुंथी हुई (Entangled) इकाई है जहाँ सब कुछ हर दूसरी चीज से जुड़ा हुआ है। अद्वैत वेदांत हमें बताता है कि चेतना के स्तर पर ‘द्वैत’ एक भ्रम है; हम सब एक ही ब्रह्म की अभिव्यक्ति हैं।

क्या यह संभव है कि प्राचीन ऋषियों ने ‘समाधि’ (चेतना की उच्चतम अवस्था) में जिस अद्वैत का अनुभव किया, वही सत्य आज वैज्ञानिक अपने यंत्रों और गणितीय समीकरणों के माध्यम से ‘नॉन-लोकैलिटी’ के रूप में खोज रहे हैं? डेविड बोम जैसे भौतिकविदों ने ‘इम्प्लीकेट ऑर्डर’ (Implicate Order) की परिकल्पना की थी—एक ऐसा गहरा स्तर जहाँ सब कुछ एक साथ लिपटा हुआ है, और जो हमें ‘मैटर’ (पदार्थ) के रूप में दिखता है, वह उसी अखंड पूर्णता का ‘एक्सप्लिकेट’ (Explicate) या प्रकट रूप है। यह विचार वेदांत के ‘अव्यक्त’ और ‘व्यक्त’ के सिद्धांत के अत्यंत निकट है।

इस अन्वेषण का उद्देश्य विज्ञान को धर्म बनाना या धर्म को विज्ञान सिद्ध करना नहीं है, अपितु यह समझना है कि सत्य एक ही है, भले ही उस तक पहुँचने के मार्ग भिन्न हों। क्वांटम एन्टैंगलमेंट हमें बाध्य करता है कि हम अपने विश्वदृष्टिकोण (Worldview) को बदलें। हम अलग-थलग द्वीप नहीं हैं; हम एक असीम महासागर की लहरें हैं। यह वैज्ञानिक समझ, जब वेदांत की दार्शनिक गहराई के साथ मिलती है, तो यह केवल बौद्धिक संतुष्टि ही नहीं देती, बल्कि हमारे जीवन जीने के ढंग, हमारी नैतिकता और हमारे वैश्विक बंधुत्व की भावना को भी रूपांतरित करने की क्षमता रखती है।

अगले खंडों में, हम चर्चा करेंगे कि किस प्रकार ‘पर्यवेक्षक प्रभाव’ (Observer Effect) और वेदांत के ‘साक्षी भाव’ में समानताएं हैं, और कैसे आधुनिक विज्ञान ‘माया’ की अवधारणा के करीब पहुँच रहा है…

Quantum Entanglement and Advaita Vedanta – Part 2

पूर्ववर्ती खंड में हमने क्वांटम एन्टैंगलमेंट (Quantum Entanglement) और अद्वैत वेदांत के ब्रह्म की एकात्मकता के मध्य आश्चर्यजनक समानताओं का अवलोकन किया। हमने यह समझा कि कैसे विज्ञान अब उस ‘अद्वैत’ की दहलीज पर खड़ा है, जिसकी उद्घोषणा उपनिषदों ने सहस्राब्दियों पूर्व कर दी थी। अब, इस चिंतन को और अधिक गहनता की ओर ले जाते हुए, हम वास्तविकता के उन आयामों का अन्वेषण करेंगे जिन्हें हम ‘दिक्’ (Space) और ‘काल’ (Time) के रूप में जानते हैं। क्या दूरी वास्तविक है? क्या ब्रह्मांड के एक कोने में स्थित कण और दूसरे कोने में स्थित कण वास्तव में अलग हैं, या यह केवल हमारी इंद्रियों का भ्रम है? इस खंड में, हम ‘माया’ की अवधारणा और आधुनिक भौतिकी के ‘होलोग्राफिक यूनिवर्स’ सिद्धांत के मध्य के सूक्ष्म संबंधों को उजागर करेंगे।

माया और स्पेस-टाइम: क्या भौतिक दूरी केवल एक इंद्रियजन्य भ्रम है?

आधुनिक भौतिकी का सबसे बड़ा विरोधाभास ‘दिक्-काल’ (Space-Time) की प्रकृति में निहित है। अल्बर्ट आइंस्टीन के सापेक्षता के सिद्धांत (Theory of Relativity) ने यह स्थापित किया कि दिक्-काल एक चादर की भांति है, जिसे द्रव्यमान (Mass) विकृत करता है। इस सिद्धांत के अनुसार, किसी भी सूचना या वस्तु की गति प्रकाश की गति (Speed of Light) से अधिक नहीं हो सकती। यह सीमा ही ‘दूरी’ को अर्थ प्रदान करती है; यदि प्रकाश की गति की सीमा न हो, तो ‘यहाँ’ और ‘वहाँ’ के बीच का भेद समाप्त हो जाएगा। किन्तु, क्वांटम एन्टैंगलमेंट ने इस धारणा को एक गंभीर चुनौती दी है। जब दो एन्टैंगल्ड कण ब्रह्मांड के दो विपरीत छोरों पर स्थित होते हैं और एक में परिवर्तन करने पर दूसरे में तात्कालिक (Instantaneous) परिवर्तन होता है, तो यह सिद्ध करता है कि उनके लिए ‘दूरी’ का कोई अस्तित्व नहीं है। क्वांटम स्तर पर, स्पेस-टाइम का वह ढांचा, जिसे हम परम सत्य मानते हैं, ध्वस्त होता प्रतीत होता है।

दृष्टा और दृश्य का एकीकरण
दृष्टा और दृश्य का एकीकरण

यही वह बिंदु है जहाँ अद्वैत वेदांत की ‘माया’ की अवधारणा वैज्ञानिक विमर्श में प्रासंगिक हो उठती है। प्रायः ‘माया’ का अनुवाद ‘भ्रम’ या ‘जादू’ के रूप में किया जाता है, जो इसका अत्यंत सतही अर्थ है। शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन में, माया वह शक्ति है जो ‘एक’ (ब्रह्म) को ‘अनेक’ (जगत) के रूप में प्रदर्शित करती है। यह ‘सदसद्विलक्षणा’ है—अर्थात् न तो यह पूर्णतः सत्य है (क्योंकि ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है) और न ही पूर्णतः असत्य (क्योंकि व्यावहारिक जगत में हम इसका अनुभव करते हैं)। माया दिक् और काल (Space and Time) का ही दूसरा नाम है। स्वामी विवेकानंद ने अपने व्याख्यानों में स्पष्ट किया था कि “दिक्, काल और निमित्त (Causality) ही वह कांच है जिसके माध्यम से हम एक अखंड ब्रह्म को बहुधा देखते हैं।”

“यच्च किञ्चिज्जगत्यस्मिन् दृश्यते श्रूयतेऽपि वा।
अन्तर्बहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः॥”
— महानारायण उपनिषद्

(इस जगत में जो कुछ भी देखा या सुना जाता है, उस सबके भीतर और बाहर नारायण [परम चेतना] व्याप्त होकर स्थित है। अर्थात्, भेद केवल दृश्य में है, दृष्टा और अधिष्ठान में नहीं।)

भौतिकी में ‘नॉन-लोकैलिटी’ (Non-locality) का सिद्धांत यह दर्शाता है कि कणों का पृथक अस्तित्व (Separateness) एक मौलिक सत्य नहीं है, बल्कि एक उद्भूत गुण (Emergent Property) है। यदि हम इसे वेदांत की दृष्टि से देखें, तो ‘दूरी’ केवल एक ‘व्यावहारिक सत्य’ (Empirical Reality) है, न कि ‘पारमार्थिक सत्य’ (Absolute Reality)। जिस प्रकार स्वप्न में देखा गया विशाल नगर जागने पर मस्तिष्क के भीतर ही विलीन हो जाता है, और स्वप्न के अंतर्गत अनुभूत मीलों की दूरी का कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं होता, उसी प्रकार क्वांटम यांत्रिकी यह संकेत दे रही है कि हमारा त्रिविमीय (3D) ब्रह्मांड एक गहरे, अविभाज्य स्तर का प्रक्षेपण मात्र हो सकता है।

स्थानिक पृथकता (Spatial Separation) का मिथ्यात्व

जब हम कहते हैं कि माया ‘अघटनघटनापटीयसी’ (घटित न होने योग्य को भी घटित करने वाली) है, तो हम इसी विरोधाभास की बात कर रहे होते हैं जहाँ ‘एक’ ही ‘अनेक’ प्रतीत होता है। क्वांटम क्षेत्र सिद्धांत (Quantum Field Theory) के अनुसार, रिक्त स्थान या शून्य (Vacuum) वास्तव में रिक्त नहीं है, बल्कि यह ऊर्जा के सतत स्पंदनों से भरा है। समस्त पदार्थ इसी क्वांटम क्षेत्र (Quantum Field) के उत्तेजित अवस्था (Excitation) मात्र हैं।

  • एकीकृत क्षेत्र (Unified Field): जिस प्रकार समुद्र में उठने वाली विभिन्न लहरें समुद्र से अलग नहीं हैं, वे केवल जल का ही एक रूप हैं, उसी प्रकार भिन्न-भिन्न प्रतीत होने वाले कण एक ही क्वांटम क्षेत्र की अभिव्यक्ति हैं।
  • अध्यास (Superimposition): वेदांत में ‘अध्यास’ का सिद्धांत कहता है कि हम रस्सी (अधिष्ठान) पर सर्प (प्रतीत) का आरोपण करते हैं। विज्ञान के संदर्भ में, हम उस अविभाज्य ऊर्जा क्षेत्र (Energy Field) पर ‘पदार्थ’ और ‘दूरी’ का आरोपण कर रहे हैं।
  • निरीक्षक का प्रभाव: क्वांटम यांत्रिकी में पर्यवेक्षक (Observer) का महत्व और वेदांत में साक्षी चैतन्य (Witness Consciousness) की प्रधानता यह सिद्ध करती है कि यह ‘दूरी’ और ‘भेद’ वस्तुगत (Objective) न होकर विषयगत (Subjective) अधिक है।

इंद्रजाल (Indra’s Net) और होलोग्राफिक यूनिवर्स: प्राचीन रूपकों और आधुनिक भौतिकी में समानताएं

बौद्ध दर्शन (विशेषकर अवतंसक सूत्र) और वैदिक परंपराओं में ‘इंद्रजाल’ (Indra’s Net) का एक अत्यंत सशक्त रूपक मिलता है। कल्पना करें एक ऐसे अनंत जाल की जो समस्त ब्रह्मांड में फैला हुआ है। इस जाल की प्रत्येक गांठ (Node) पर एक बहुआयामी रत्न जड़ा है। ये रत्न इस प्रकार व्यवस्थित हैं कि यदि आप किसी एक रत्न को देखें, तो उसमें आपको अन्य सभी रत्नों का प्रतिबिंब दिखाई देगा। इतना ही नहीं, उन प्रतिबिंबित रत्नों में भी पुनः अन्य सभी रत्नों का प्रतिबिंब होगा—यह प्रक्रिया अनंत तक चलती है। यह रूपक ‘प्रतीत्यसमुत्पाद’ (Interdependent Co-arising) और ब्रह्मांडीय अन्योन्याश्रयता (Cosmic Interconnectedness) का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है।

इंद्रजाल: अनंत परावर्तन
इंद्रजाल: अनंत परावर्तन

आश्चर्यजनक रूप से, आधुनिक भौतिकी में ‘होलोग्राफिक यूनिवर्स’ (Holographic Universe) का सिद्धांत इंद्रजाल के इस रूपक का वैज्ञानिक संस्करण प्रतीत होता है। 1990 के दशक में, लियोनार्ड सुसकिंड (Leonard Susskind) और जेरार्ड टी. होफ्ट (Gerard ‘t Hooft) जैसे भौतिकविदों ने, ब्लैक होल के अध्ययन और स्ट्रिंग थ्योरी के आधार पर, यह प्रस्ताव रखा कि हमारा त्रिविमीय ब्रह्मांड (3D Universe) वास्तव में एक द्विविमीय (2D) सूचना संरचना का प्रक्षेपण (Projection) हो सकता है, ठीक वैसे ही जैसे एक होलोग्राम 2D सतह पर होने के बावजूद 3D छवि प्रस्तुत करता है।

होलोग्राम की प्रकृति और ‘पूर्णमदः पूर्णमिदं’

होलोग्राम की सबसे विशिष्ट विशेषता यह है कि यदि आप उसके फिल्म प्लेट को टुकड़ों में तोड़ दें, तो प्रत्येक छोटा टुकड़ा केवल उस टुकड़े के हिस्से को नहीं दिखाता, बल्कि वह संपूर्ण छवि को अपने भीतर समाहित रखता है (यद्यपि थोड़ी कम स्पष्टता के साथ)। इसका अर्थ है कि ‘अंश’ में ‘पूर्ण’ निहित है। यह भौतिकी का सिद्धांत ईशावास्योपनिषद् के शांति मंत्र की वैज्ञानिक व्याख्या जैसा प्रतीत होता है:

“ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥”
— ईशावास्योपनिषद्

(वह (परब्रह्म) पूर्ण है, यह (कार्यब्रह्म/जगत) भी पूर्ण है। पूर्ण से पूर्ण की उत्पत्ति होती है। पूर्ण में से पूर्ण निकाल लेने पर भी पूर्ण ही शेष रहता है।)

डेविड बोम (David Bohm), जो बीसवीं सदी के महानतम क्वांटम भौतिकविदों में से एक थे, ने ‘इम्प्लिकेट ऑर्डर’ (Implicate Order – अव्यक्त व्यवस्था) और ‘एक्सप्लिकेट ऑर्डर’ (Explicate Order – व्यक्त व्यवस्था) का सिद्धांत दिया। उनके अनुसार, जिसे हम भौतिक जगत (स्पेस-टाइम और पदार्थ) के रूप में देखते हैं, वह ‘एक्सप्लिकेट ऑर्डर’ है—जो कि एक गहरे, अंतर्निहित ‘इम्प्लिकेट ऑर्डर’ का प्रकटीकरण मात्र है।

  • अव्यक्त व्यवस्था (Implicate Order): यह वह स्तर है जहाँ सब कुछ, सब कुछ में समाहित है (Everything is enfolded into everything). यहाँ दिक् और काल का भेद नहीं है। यह वेदांत के ‘अव्यक्त’ या ‘कारण शरीर’ के समतुल्य है।
  • व्यक्त व्यवस्था (Explicate Order): यह वह स्तर है जो हमारी इंद्रियों के लिए प्रकट होता है—जहाँ वस्तुएं अलग-अलग और दूर-दूर दिखाई देती हैं। यह माया का कार्यक्षेत्र है, जिसे हम ‘स्थूल जगत’ कहते हैं।

बोम का मानना था कि इलेक्ट्रॉन जैसे कण स्वतंत्र रूप से अस्तित्व नहीं रखते, बल्कि वे एक गहरी वास्तविकता के ‘होलोग्राफिक’ प्रक्षेपण हैं। यदि दो कण एन्टैंगल्ड हैं और एक-दूसरे से संपर्क साधते प्रतीत होते हैं, तो ऐसा इसलिए नहीं है कि वे प्रकाश से तेज संकेत भेज रहे हैं, बल्कि इसलिए है क्योंकि गहरे (अव्यक्त) स्तर पर वे कभी अलग हुए ही नहीं थे। इंद्रजाल के रूपक की भांति, ब्रह्मांड का प्रत्येक बिंदु समस्त ब्रह्मांड की सूचना को अपने भीतर धारण करता है।

निष्कर्ष: विज्ञान और अध्यात्म का संगम

जैसे-जैसे हम क्वांटम यांत्रिकी और ब्रह्मांड विज्ञान की गहराइयों में उतरते हैं, ‘वस्तुनिष्ठ वास्तविकता’ (Objective Reality) की हमारी पुरानी धारणाएं खंडित होती जा रही हैं। माया और इंद्रजाल जैसी प्राचीन अवधारणाएं, जिन्हें कभी केवल दार्शनिक रूपक माना जाता था, अब वास्तविकता की संरचना को समझने के लिए सटीक मॉडल प्रदान करती हुई प्रतीत होती हैं।

स्पेस-टाइम एक निरपेक्ष मंच नहीं है जिस पर ब्रह्मांड का नाटक चल रहा है, बल्कि यह स्वयं उस नाटक का एक हिस्सा है—एक मानसिक या चेतनात्मक निर्माण। अद्वैत वेदांत और आधुनिक भौतिकी, दोनों ही भिन्न-भिन्न भाषाओं में एक ही सत्य की ओर संकेत कर रहे हैं: विभाजन भ्रम है, और अखंडता ही एकमात्र सत्य है। अगले और अंतिम खंड में, हम ‘चेतना’ (Consciousness) की भूमिका (The Measurement Problem) और ‘दृष्टि-सृष्टि वाद’ पर विचार करेंगे, जो यह स्थापित करता है कि क्या यह ब्रह्मांड हमारे देखने से अस्तित्व में आता है?

Here is the completion of the scholarly blog, written in Shuddh Scholarly Hindi, adhering to the specified formatting and content requirements. Science and Vedanta Blog

ऑब्जर्वर इफेक्ट और दृष्टा-दृश्य विवेक: क्या मानव चेतना ही पदार्थ के स्वरूप को निर्धारित करती है?

आधुनिक भौतिक विज्ञान के इतिहास में क्वांटम यांत्रिकी (Quantum Mechanics) का उदय न केवल वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, अपितु दार्शनिक परिप्रेक्ष्य से भी एक क्रांतिकारी घटना थी। चिरसम्मत भौतिकी (Classical Physics) जिस वस्तुनिष्ठ यथार्थ (Objective Reality) की वकालत करती थी, जहाँ प्रेक्षक (Observer) और प्रेक्षित (Observed) के मध्य एक स्पष्ट और अभेद्य दीवार थी, वह क्वांटम स्तर पर ध्वस्त हो गई। यहाँ ‘ऑब्जर्वर इफेक्ट’ (Observer Effect) का सिद्धांत सामने आता है, जो यह प्रतिपादित करता है कि मात्र अवलोकन की क्रिया ही किसी घटना या पदार्थ की स्थिति को परिवर्तित कर सकती है। प्रसिद्ध ‘डबल स्लिट प्रयोग’ (Double Slit Experiment) ने यह सिद्ध किया कि इलेक्ट्रॉन जैसे उप-परमाण्विक कण तब तक तरंग (Wave) की तरह व्यवहार करते हैं जब तक कि उन्हें देखा नहीं जाता; किन्तु जैसे ही कोई प्रेक्षक या मापक यंत्र उन्हें देखता है, वे कण (Particle) के रूप में व्यवहार करने लगते हैं।

विज्ञान और प्राचीन प्रज्ञा का सेतु
विज्ञान और प्राचीन प्रज्ञा का सेतु

यह वैज्ञानिक विरोधाभास हमें आदि शंकराचार्य विरचित ‘दृग्-दृश्य विवेक’ (Drg-Drishya Viveka) की ओर ले जाता है। अद्वैत वेदांत का यह मूलभूत ग्रंथ ‘दृष्टा’ (देखने वाला) और ‘दृश्य’ (जिसे देखा जा रहा है) के बीच के संबंध का अत्यंत सूक्ष्म विश्लेषण करता है। वेदांत का मत है कि यह सम्पूर्ण दृश्य जगत (Drishya) जड़ है और परिवर्तनशील है, जबकि इसे प्रकाशित करने वाली चेतना (Drishta) नित्य और अपरिवर्तनीय है। भौतिकी जिसे ‘वेव फंक्शन का निपात’ (Collapse of the Wave Function) कहती है, वेदांत की भाषा में वह ‘माया’ का खेल है, जहाँ चेतना के संयोग से अव्यक्त शक्ति व्यक्त जगत का रूप धारण कर लेती है।

“रूपं दृश्यं लोचनं दृक् तद्दृश्यं दृक्तु मानसम्।
दृश्या धीवृत्तयः साक्षी दृगेव न तु दृश्यते॥”

भावार्थ: रूप दृश्य है और नेत्र उसका दृष्टा है; पुनः नेत्र दृश्य है और मन उसका दृष्टा है; मन की वृत्तियाँ दृश्य हैं और साक्षी चैतन्य (आत्मा) उनका दृष्टा है। वह साक्षी स्वयं दृष्टा है, दृश्य कभी नहीं होता।

यहाँ एक गहरा प्रश्न उठता है: क्या ब्रह्मांड का अस्तित्व हमारे अवलोकन पर निर्भर है? विज्ञान अब ‘सहभागितापूर्ण ब्रह्मांड’ (Participatory Universe) की बात करने लगा है, जहाँ मानव चेतना केवल एक निष्क्रिय साक्षी नहीं है, बल्कि वास्तविकता के निर्माण में एक सक्रिय घटक है। इसे हम निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से और अधिक स्पष्टता से समझ सकते हैं:

  • मापन की समस्या (The Measurement Problem): क्वांटम भौतिकी में, जब तक मापन नहीं किया जाता, वास्तविकता ‘संभावनाओं’ (Superposition) में विद्यमान रहती है। वेदांत के अनुसार, यह संसार भी अव्यक्त ‘प्रकृति’ या ‘माया’ के रूप में रहता है जब तक कि ‘ब्रह्म-चैतन्य’ इसे प्रकाशित नहीं करता।
  • साक्षी भाव (Witness Consciousness): वैज्ञानिक प्रयोग में प्रेक्षक बाह्य होता है, किन्तु वेदांत उस ‘परम प्रेक्षक’ की ओर इंगित करता है जो हमारे मन और बुद्धि के क्रियाकलापों को भी देख रहा है। यह ‘साक्षी’ ही वह अंतिम सत्य है जिसके कारण भौतिक जगत का अनुभव संभव हो पाता है।
  • चेतना की प्रधानता: पदार्थ (Matter) चेतना को उत्पन्न नहीं करता, जैसा कि भौतिकवाद मानता था; अपितु, क्वांटम सिद्धांत और उपनिषद दोनों अब इस निष्कर्ष की ओर बढ़ रहे हैं कि चेतना ही आधारभूत वास्तविकता है, और पदार्थ उसका एक स्थूल प्रकटीकरण मात्र है।

अतः, ऑब्जर्वर इफेक्ट ने विज्ञान को उस सीमा पर लाकर खड़ा कर दिया है जहाँ उसे चेतना के अस्तित्व को स्वीकार करना पड़ रहा है। यह वही सीमा है जहाँ से अध्यात्म की यात्रा आरम्भ होती है। जब वैज्ञानिक यह पूछते हैं कि “प्रेक्षक कौन है?”, तो वे अनजाने में ही उपनिषदों के उस महावाक्य की गूँज को दोहरा रहे होते हैं—”कस्त्वम्?” (तुम कौन हो?)।

निष्कर्ष: विज्ञान और उपनिषदों का समन्वय—एक पूर्णतावादी विश्वदृष्टि की ओर

मानव बौद्धिकता की यात्रा, जो सदियों पूर्व बाह्य जगत के अन्वेषण से आरम्भ हुई थी, आज एक पूर्ण चक्र (Full Circle) बनाकर पुनः आत्म-अन्वेषण पर आ टिकी है। विज्ञान और उपनिषदों का द्वंद्व अब अप्रासंगिक हो चला है; आवश्यकता है इनके समन्वय की। विज्ञान ने हमें ‘क्या’ (What) और ‘कैसे’ (How) का उत्तर दिया है, किन्तु ‘क्यों’ (Why) और ‘कौन’ (Who) का उत्तर उपनिषदों के पास सुरक्षित है। आधुनिक भौतिकी ने पदार्थ को ऊर्जा में विलीन कर दिया है (E=mc²), और वेदांत ने उस ऊर्जा को ‘चित्-शक्ति’ या चेतना के रूप में पहचाना है। यह समन्वय केवल बौद्धिक विलास नहीं है, अपितु मानवता के भविष्य के लिए एक अनिवार्य आवश्यकता है।

अद्वैत का सागर
अद्वैत का सागर

एक पूर्णतावादी विश्वदृष्टि (Holistic Worldview) का निर्माण तभी संभव है जब हम ‘व्यावहारिक सत्य’ (Empirical Reality – विज्ञान का क्षेत्र) और ‘पारमार्थिक सत्य’ (Absolute Reality – वेदांत का क्षेत्र) को एक साथ रखकर देखें। अल्बर्ट आइंस्टीन ने एक बार कहा था, “धर्म के बिना विज्ञान लंगड़ा है, और विज्ञान के बिना धर्म अंधा है।” यह कथन आज के संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक है। यदि हम केवल भौतिक उन्नति पर ध्यान केंद्रित करेंगे, तो हम एक यंत्रवत समाज का निर्माण करेंगे जिसमें सुख तो होगा पर शांति नहीं। और यदि हम वैज्ञानिक तर्क को नकार कर केवल रूढ़िवादी अध्यात्म को अपनाएंगे, तो हम अंधविश्वास के गर्त में गिर जाएंगे।

समन्वय के स्वर्णिम सूत्र:

  1. एकात्मता (Oneness): विज्ञान का ‘यूनिफाइड फील्ड थ्योरी’ (Unified Field Theory) और वेदांत का ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ (यह सब कुछ ब्रह्म ही है)—दोनों ही अस्तित्व की मूलभूत एकता की ओर संकेत करते हैं।
  2. अंतरसंबंधितता (Interconnectedness): क्वांटम एंटैंगलमेंट (Quantum Entanglement) ने सिद्ध किया है कि ब्रह्मांड के एक कोने में स्थित कण दूसरे कोने के कण से जुड़ा है। उपनिषद इसे ‘सूत्रात्मा’ कहते हैं, वह सूत्र जो समस्त प्राणियों को एक माला के मनकों की तरह जोड़ता है।
  3. चेतना का विकास: विज्ञान को अब चेतना के अध्ययन (Consciousness Studies) को अपनी परिधि में सम्मिलित करना होगा, और अध्यात्म को वैज्ञानिक विधियों (तर्क और प्रमाण) का स्वागत करना होगा।

अंततः, यह ब्लॉग इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि सत्य खंडित नहीं है। प्रयोगशाला में नली (Test tube) को देखने वाला वैज्ञानिक और हिमालय की कंदरा में ध्यानस्थ योगी—दोनों ही एक ही सत्य की खोज कर रहे हैं। अंतर केवल उपकरण का है; वैज्ञानिक का उपकरण ‘बुद्धि’ और ‘यंत्र’ है, जबकि योगी का उपकरण ‘अंतःकरण’ और ‘अनुभूति’ है। जिस दिन यह दोनों मार्ग मिल जाएंगे, उस दिन मानव सभ्यता अज्ञान के अंधकार से निकलकर पूर्ण ज्ञान के प्रकाश में प्रवेश करेगी। यही वह स्थिति है जिसे ईशावास्योपनिषद में ‘विद्या’ और ‘अविद्या’ के पार जाने की स्थिति कहा गया है।

“पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥”

भावार्थ: वह (परब्रह्म) पूर्ण है, यह (कार्यब्रह्म/जगत) भी पूर्ण है। उस पूर्ण से ही यह पूर्ण उद्भूत हुआ है। उस पूर्ण में से इस पूर्ण को निकाल लेने पर भी वह पूर्ण ही शेष रहता है। अनंत से अनंत निकालने पर अनंत ही बचता है।

यही विज्ञान और आध्यात्म का अंतिम गंतव्य है—अपूर्णता से पूर्णता की ओर, मृत्यु से अमरता की ओर, और द्वैत से अद्वैत की ओर प्रस्थान। आइए, हम इस समन्वित दृष्टि को अपनाएं और एक ऐसे समाज का निर्माण करें जो वैज्ञानिक रूप से उन्नत हो और आध्यात्मिक रूप से जागृत हो।

॥ इति शुभम् ॥

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *